Betul Samachar: फॉलोअप : जिले में चुने हुए 3 प्रमुख आदिवासी प्रतिनिधि, फिर भी ठगा जा रहा समाज

फर्जीवाड़े के आरोपों के बाद भी सांसद-केंद्रीय मंत्री समेत तीन आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने साधी चुप्पी, प्रशासनिक जांच और जिम्मेदारी तय करने की उठी मांग
Betul Samachar: बैतूल। जिले के रजिस्ट्रार कार्यालय में जमीनों की रजिस्ट्री को लेकर सामने आ रहे मामलों ने अब सिर्फ पंजीयन व्यवस्था ही नहीं, बल्कि आदिवासी हितों की पैरवी करने वाले जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सांझवीर टाइम्स द्वारा रजिस्ट्रार कार्यालय में सामने आ रही अनियमितताओं को लेकर प्रकाशित खबरों के बाद एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें पांचवीं अनुसूची क्षेत्र की बताई जा रही आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासी के नाम रजिस्ट्री किए जाने और बाद में नामांतरण किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। मामले में नियमों की अनदेखी हुई या नहीं, यह जांच का विषय है, लेकिन सवाल यह है कि आदिवासी हितों की बात करने वाले जिले के तीन प्रमुख जनप्रतिनिधि अब तक इस पूरे मामले पर सामने क्यों नहीं आए हैं।
मामला दामजीपुरा क्षेत्र की जमीन से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता परिवार का आरोप है कि आदिवासी परिवार की जमीन के दस्तावेजों में उसे गैर-अधिसूचित क्षेत्र बताकर रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद महज 20 दिन के भीतर नामांतरण भी कर दिया गया। शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब जमीन पांचवीं अनुसूची क्षेत्र से संबंधित है तो उसके हस्तांतरण के लिए लागू कानूनी प्रावधानों की जांच किस स्तर पर की गई।
20 दिन में रजिस्ट्री के बाद नामांतरण ने बढ़ाए सवाल
शिकायत के अनुसार 27 जनवरी को जमीन की रजिस्ट्री हुई और इसके करीब 20 दिन बाद 16 फरवरी को नामांतरण कर दिया गया। शिकायतकर्ता परिवार का कहना है कि मूल वारिसों को पर्याप्त रूप से पक्ष में लिए बिना सुनवाई और प्रक्रिया पूरी कर दी गई। मामले में तहसील रिकॉर्ड, रजिस्ट्री दस्तावेज, पटवारी प्रतिवेदन और नामांतरण आदेश की जांच की मांग की गई है।
भैंसदेही उप-पंजीयक कार्यालय में भी इसी तरह की एक अन्य रजिस्ट्री को लेकर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में आरोप है कि आदिवासी जमीन को अधिसूचित क्षेत्र से बाहर दर्शाकर दस्तावेज तैयार किए गए। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक रजिस्ट्री की अनियमितता नहीं, बल्कि पंजीयन से लेकर राजस्व रिकॉर्ड तक पूरी प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़ा करेगा।
सांसद-केंद्रीय मंत्री से लेकर दोनों विधायकों की चुप्पी क्यों?
बैतूल जिले में आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन प्रमुख जनप्रतिनिधि हैं—बैतूल सांसद एवं केंद्रीय मंत्री दुर्गादास उइके, भैंसदेही विधायक महेंद्र सिंह चौहान और घोड़ाडोंगरी विधायक गंगा उइके। आदिवासी अधिकार और पांचवीं अनुसूची क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि आदिवासी परिवार की जमीन वास्तव में नियमों की अनदेखी कर गैर-आदिवासी के नाम की गई है तो इस मामले में जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन से जवाब क्यों नहीं मांगा? क्या उन्होंने संबंधित रजिस्ट्री और नामांतरण रिकॉर्ड की जानकारी ली है? क्या उन्होंने कलेक्टर से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है? और यदि जांच में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए वे पहल करेंगे?
कॉलोनाइजरों को फायदा पहुंचाने के आरोप की भी जांच जरूरी
शिकायतकर्ता परिवार ने जमीन के हस्तांतरण के पीछे बड़े हितों की आशंका भी जताई है। आरोप है कि आदिवासी जमीन को सामान्य भूमि के रूप में प्रस्तुत कर उसका हस्तांतरण कराने से भविष्य में कॉलोनाइजरों या जमीन कारोबार से जुड़े लोगों को फायदा पहुंच सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक जांच जरूरी है। पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस जमीन का वास्तविक रिकॉर्ड आदिवासी स्वामित्व और अनुसूचित क्षेत्र से जुड़ा है, उसकी स्थिति बदलने का आधार क्या था? किस अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच की? रजिस्ट्री से पहले जमीन की प्रकृति और पात्रता का सत्यापन किस स्तर पर हुआ? नामांतरण से पहले राजस्व रिकॉर्ड का परीक्षण किसने किया?
- Also Read: Betul ki Khabar: बैतूल में आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री पर सवाल, अधिसूचित क्षेत्र को गैर-अधिसूचित बताया
अब जांच सिर्फ रजिस्ट्री तक नहीं, पूरे रिकॉर्ड की हो
मामले में शिकायतकर्ता परिवार ने कलेक्टर से चार प्रमुख मांगें रखी हैं—विवादित जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए, 27 जनवरी की रजिस्ट्री और 16 फरवरी के नामांतरण की जांच की जाए, अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो और पांचवीं अनुसूची क्षेत्र की जमीन के हस्तांतरण से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए।
अब प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ एक रजिस्ट्री की जांच करने की नहीं है।
सवाल यह भी है कि जिले में ऐसी कितनी जमीनें हैं, जिनकी प्रकृति या श्रेणी बदलकर उनका हस्तांतरण किया गया? क्या रजिस्ट्री कार्यालय और राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीन की स्थिति का नियमित मिलान होता है? यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच से ही सामने आ सकते हैं। साथ ही आदिवासी समाज के प्रतिनिधि तीनों जनप्रतिनिधियों से भी यह अपेक्षा की जा रही है कि वे मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करें और यदि शिकायत में तथ्य हैं तो संबंधित परिवार को न्याय दिलाने के लिए प्रशासन के समक्ष आवाज उठाएं।
हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें
👇https://chat.whatsapp.com/KWRuTRhIWoXDiwhdwiCm29?mode=gi_t
बैतूल जिले की ताजा खबरें (Hindi News Madhyapradesh) अब हिंदी में पढ़ें| Trending और Viral खबरों के लिए जुड़े रहे snewstimes.com से| आज की ताजा खबरों (Latest Hindi News) के लिए सर्च करें snewstimes.com




