Betul Forest News : सागौन पर कीटों का हमला, हरी पत्तियां नजर नहीं आ रही, पश्चिम वन मंडल की चार रेंजों में जंगल के जंगल साफ, अधिकारी बेखबर
Betul Forest News: Attack of pests on teak, green leaves are not visible, forests are clean in four ranges of West Forest Division, officials oblivious

Betul Forest News : (बैतूल)। जिले के पश्चिम वनमंडल के मोहदा रेंज सहित तावड़ी चिचोली ,सांवलीगढ़ और गवासेन रेंज में बारिश के मौसम में पतझड़ का नजारा देखने को मिल रहा है। बारिश के मौसम में सागौन के जंगल उदास है । जून माह में नए पत्तों के आने के बाद अगस्त माह में यदि जंगल मे सागौन के पेड़ों से पत्ते सूखकर जमीन पर गिर जाते हैं तो पूरे जंगल उदास नजर आते है । इस ओर वन विभाग का ध्यान ही नहीं है। अधिकारी कहते हैं कि फिर नए पत्ते आ ही जाएंगे, परन्तु तब तक पेड़ कैसे भोजन लेगा और ग्रोथ कितनी रुक जाएगी। इस सवाल का कोई जवाब नहीं देते हैं। वन विभाग बीमारी की रोकथाम के लिए बजट नहीं होने की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है।
बारिश के मौसम में सागौन के पेड़ों पर कीटों का प्रकोप फैल रहा है। प्रकोप इतना ज्यादा है कि जंगल के सैकड़ो हेक्टेयर क्षेत्र के सागौन पेड़ों के पत्ते कीटों ने खाकर पूरी तरह से चट कर दिए हैं। उक्त कीट तेजी से एक पेड़ से दूसरे पड़ों पर हमला कर रहे हैं। कीटों ने जंगल के जंगल साफ कर दिए। वन विभाग के पास इसे नियंत्रित करने का कोई उपचार नहीं है। हालांकि विभागीय अफसरों का मानना है इससे पेड़ की लकड़ी को कोई नुकसान नहीं होता। पत्ते भी दोबारा आ जाएंगे।
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नहीं बचा एक भी हरा पत्ता (Betul Forest News)

पेड़ों पर कीट प्रकोप की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जंगल में खड़े अधिकांश पेड़ों में एक भी पत्ता नहीं बचा है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो जंगल में पतझड़ आ गया है। पास जाने पर पता चलता है कि पत्तों में केवल उनकी मोटी शिराएं भी बची हैं। विशेषज्ञों के अनुसार शिराओं को कीट खा नहीं पाते, इसलिए वे बच जाती हैं। जबकि पत्ते का नाजुक हरे रंग का हिस्सा पूरी तरह खत्म हो चुका है। यह स्थिति एक-दो नहीं, बल्कि जंगल के हजारों पेड़ों की है।
स्कलेटिलाइजर का प्रकोप
वन मंडल अधिकारी वरुण यादव ने बताया कि बारिश के दिनों में हर साल सागौन के पेड़ों पर स्कलेटिनाइर नामक कीट का प्रकोप होता है। यह कीट पेड़ के पत्तों को खाता है। यह बड़ी तेजी से फैलता है। इसे दवा का छिडक़ाव करके ही नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकता। इतने बड़े जंगल और ऊंचे पेड़ों पर दवा का छिडक़ाव कैसे किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बारिश के बाद उक्त प्रकोप अपने आप ही खत्म हो जाएगा। इसके बाद पेड़ों पर दोबारा पत्ते आ जाएंगे। इस संबंध में पर्यावरणविद् कहते है कि सागौन के पेड़ में इस तरह का प्रकोप हर साल आता है। इससे पेड़ को खासा नुकसान होता है।
पत्ते खत्म हो जाने से पेड़ की खाना बनाने की प्रक्रिया बंद हो जाती है। इससे पेड़ की वृद्घि रुक जाती है। लकड़ी की गुणवत्ता पर भी फर्क पड़ता है। जिन देशों में सागौन के सघन वन हैं, वहां दवा का छिडक़ाव कर इस पर काबू किया जाता है। हमारे यहां वन विभाग द्वारा समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। इस पर नियंत्रण के लिए गंभीरता से प्रयास करना चाहिए।




