Political News : कुंबी V/S पवार तो कांग्रेस विजयी, कुंबी V/S कुंबी तो भाजपा विजयी!
Political News: Kumbi V/S Pawar then Congress wins, Kumbi V/S Kumbi then BJP wins!

फिर भी मुलताई में भाजपा का ही खेल बिगाड़ने पर तुले पार्टी के समर्पित कहलाने वाले कर्ताधर्ता
बैतूल। यह जुमला सौ प्रतिशत सही है कि जिसको भी राजनीति का कीड़ा काटना शुरू करता है तो उस नेता की स्थिति विनाश काले विपरीत बुद्धि जैसी हो जाती है। बिना विश्लेषण किए उसे सिर्फ इतना ही नजर आता है कि किला फतह करने की ताकत सिर्फ उसी में है, फिर चाहे खुद अपनी ही पार्टी का नुकसान क्यों ना हो जाए। मुलताई विधानसभा में रविवार कुछ इसी तरह की गतिविधि देखने को मिली, जब भाजपा से जुड़े एक निष्ठावान नेता ने दावा किया कि एक कार्यक्रम के दौरान उसे 5 हजार बहनों ने राखी बांधकर अपना समर्थन दिया है। इस लिहाज से मुलताई विधानसभा मे उसका दावा काफी मजबूत भी दिखाने की कोशिश की गई ।
वह भी ऐसे समय जब भाजपा ने कुंबी समाज से ताल्लुक रखने वाले पूर्व विधायक चन्द्रशेखर देशमुख को अपना उम्मीदवार पहले ही घोषित कर दिया गया है। पर यह नेता है कि अब इस तरह के कार्यक्रम आयोजित कर यह सबबताने की कोशिश कर रहा है कि पार्टी का निर्णय गलत है। यानी कि भाजपा में रहने के बावजूद पार्टी की रीति नीति को एक तरफ धरकर पार्टी को ही नुकसान पहुंचाने की कोशिशें की जा रही है।
खबर में किया चुनाव लड़ने का इशारा
दरअसल भाजपा से ताल्लुक रखने वाले यह नेता पिछले एक साल से मुलताई विधानसभा मे अपनी जमीन तलाशने की सर्कस कर रहे हैं। नेताजी ने यह भी सार्वजनिक कर दिया कि भाजपा में एक मात्र वे ही ऐसे उम्मीदवार हैं, जो कांग्रेस के सुखदेव पांसे को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, लेकिन जैसे ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से कुंबी प्रत्याशी चंद्रशेखर देशमुख का नाम फाइनल किया गया, उनके तेवर चढ़ गए। मरता क्या ना करता की तर्ज पर स्थानीय भाजपाई नेताओं को कोसना शुरू कर दिया।
हद तो तब हो गई, जब रविवार को विधानसभा के ही एक गांव में रक्षाबंधन का कार्यक्रम आयोजित कर यह बताने की कोशिश की गई कि लगभग 5 हजार बहनों ने राखी बांधकर नेताजी को अपना समर्थन दिया है। जबकि स्थानीय सूत्रों का मानना है कि , यह संख्या मौजूद भीड़ के हिसाब से लगभग 6 गुना ज्यादा बताई जा रही है। वहीं राजनीति के जानकार इस कवायद को कोरा स्टंट से ज्यादा नहीं बता रहे।
क्या कहता है मुलताई का चुनावी गणित
इस पूरे मामले को लेकर राजनीति के जानकार बताते हैं कि मुलताई का चुनावी गणित निश्चित रूप से कुंबी और पवार समाज पर ही टिका हुआ है। दोनों ही समाजों के मतदाताओं में मुश्किल से दो- ढाई हजार वोटों का अंतर है। वर्ष 2013 के चुनावों पर नजर डालें तो इस चुनाव में कांग्रेस के सुखदेव पांसे और भाजपा के चंद्रशेखर देशमुख के बीच ही मुकाबला हुआ था। यानी दोनों ही पार्टियों ने एक ही समुदाय कुंबी समाज से ही अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।
इस चुनाव में भाजपा के चन्द्रशेखर देशमुख ने कांग्रेस के सुखदेव पांसे को कड़ी शिकस्त देकर विधायकी हासिल कर ली थी। इसके ठीक विपरीत वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सुखदेव पांसे को पुन: टिकिट दे दी तो भाजपा ने कुंबी कैंडिडेट बदलकर पवार समाज से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के कद्दावर नेता जिला पंचायत अध्यक्ष राजा पवार पर अपना दांव खेला। इस बार यहां कुंबी और पवार उम्मीदवार आमने सामने आ गए । इसका नतीजा यह निकला कि, कांग्रेस के सुखदेव पांसे ने राजा पवार को हराकर विधायकी हासिल कर ली। जबकि राजा पवार का मुलताई विधान सभा मे अच्छा खासा रसूख होने के बावजूद वे चुनाव हार गए। यहां भाजपा का कुंबी वर्सेस पवार फेक्टर फेल हो गया, लेकिन जिस तरह से उक्त भाजपा नेता अपनी दावेदारी जता रहे हैं, इतना सब होने के बाद क्या गारंटी है कि वे चुनाव जीत ही जाएगे।
पुराने दांव पर वरिष्ठ नेतृत्व का विश्वास
आने वाले विधान सभा चुनावों को लेकर भाजपा फूंक- फंक कर अपने कदम आगे बढ़ा रही है। एक एक नाम पर गम्भीर मंथन किए जाने के बाद ही प्रत्याशियों के नाम फाइनल किये जा रहे हैं। राजीनीतिक विश्लेषकों की माने तो मुलताई विधानसभा मे इसबार भाजपा को हार का मुंह ना देखना पड़े इसके लिए वरिष्ठ नेतृत्व ने पूरे विश्लेषण के बाद ही चन्द्रशेखर देशमुख के नाम पर मुहर लगाई गई है, जिससे कुंबी और पवार फेक्टर को विशेष तवज्जो देने के बाद यह निर्णय लिया गया कि कुंबी के खिलाफ कुंबी उम्मीदवार का ही नाम फाइनल किया गया। इसके बावजूद नेताजी इसे मानने को तैयार नहीं है।
जिससे ऐसा लग रहा है कि उक्त नेता अब भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व को भी दरकिनार कर पार्टी के ही लिए खाई खोदने के काम मे लगे हुए हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चुनाव लड़ने की लालसा पाले कथित भाजपा नेता को कम से कम इतना तो विश्लेषण कर लेना चाहिए था कि आखिर किस आधार पर वे जीत का दावा कर रहे हैं, वह भी तब , जबकि मुलताई विधानसभा से राजा पवार चुनाव हार चुके हैं।




