Politics: राजनीतिक हलचल: इस पार्टी में समन्वय से ज्यादा समोसे की चिंता के क्या है मायने?? किस मामले में सवाल ऐसा आया कि जवाब में उम्मीद ही गायब हो गई??? प्रदर्शन में भीड़ की गिनती को लेकर आख़िर क्यों हो रही चर्चा????? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

समन्वय से ज्यादा ‘समोसे-समन्वय’ की चिंता
विपक्षी दल की समन्वय बैठक इन दिनों अपने फैसलों से ज्यादा फुल-कोर्स मेन्यू को लेकर चर्चा में है। राजनीतिक रणनीति से ज्यादा पदाधिकारियों के बीच मंथन इस बात पर चल रहा है कि अगली बैठक में दाल-बाटी-भर्ता और हरी चटनी का इंतजाम आखिर करेगा कौन? दरअसल, आगामी समन्वय बैठक की जिम्मेदारी आमला को सौंपी गई है और साथ में निर्देश भी चिपका दिए गए हैं- मेन्यू रहेगा दाल-बाटी-भर्ता, वो भी हरी चटनी के साथ। अब आमला के पदाधिकारी सिर पकडक़र बैठे हैं कि बैठक करें या भोज की व्यवस्था। मजेदार बात यह है कि जिले में जब भी यह बैठक दल के जिला प्रमुख की मेजबानी में होती है तो मामला बड़े सादगी से पोहे पर ही निपट जाता है। लेकिन जब जिम्मेदारी किसी और पर आ जाए तो मेन्यू सीधे ‘फुल प्लेट’ में पहुंच जाता है। आमला के नेताओं का कहना है कि यह पहला मौका नहीं है।
इससे पहले घोड़ाडोंगरी में भी समन्वय बैठक करवाई गई थी, तब भी मेन्यू की लंबी सूची पहले ही थमा दी गई थी। जबकि बैठक में करीब 70 लोग शामिल होते हैं, ऐसे में दाल-बाटी का इंतजाम किसी छोटे-मोटे आयोजन से कम नहीं पड़ता। पदाधिकारियों के बीच अब पुरानी बातें भी याद की जा रही हैं। जब जिला प्रमुख के चयन की कवायद चल रही थी, तब बड़े-बड़े दावे किए गए थे। पैसे वाला नेतृत्व आएगा तो बैठक में खाने-पीने से लेकर आने-जाने का किराया तक मिलेगा, लेकिन कुर्सी मिलते ही हाल यह है कि खुद की बैठकों में पोहा-नाश्ता और दूसरों की बारी आए तो सीधे दाल-बाटी-भर्ता का फरमान। अब देखना यह है कि आगामी आमला बैठक में ज्यादा चर्चा संगठन की रणनीति पर होती है या फिर दाल-बाटी की प्लेट पर। फिलहाल तो समन्वय बैठक से पहले ही पदाधिकारियों में ‘भोजन समन्वय’ का दौर जारी है।
सवाल ऐसा कि जवाब में ही उम्मीद गायब
पुनर्वास क्षेत्र की माननीय ने विधानसभा में पट्टों को लेकर सवाल क्या लगा दिया, इलाके में मानो कोई बड़ा सियासी तीर चल गया हो। समर्थक और क्षेत्र के कुछ पार्टी पदाधिकारी इसे ऐसे प्रचारित कर रहे हैं जैसे माननीय ने पट्टों की बरसात ही करवा दी हो। हालांकि विधानसभा में आए जवाब को जिसने भी ध्यान से पढ़ लिया, उसका माथा जरूर ठनक गया।
जवाब में ऐसा कुछ भी नहीं निकला जिससे यह लगे कि अब किसी को नया पट्टा मिलने वाला है। उल्टा हाल यह है कि जवाब की लाइनें पढक़र लोगों को समझ आ रहा है कि मामला पहले जैसा ही ठंडे बस्ते में है, लेकिन राजनीति में सच से ज्यादा मायने कभी-कभी प्रचार का होता है। यही वजह है कि इलाके के कुछ पदाधिकारी इसे ऐतिहासिक पहल बताने में जुटे हैं। सोशल मीडिया से लेकर बैठकों तक, माननीय के सवाल को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे पुनर्वास क्षेत्र की तकदीर ही बदल गई हो। जिन लोगों ने सवाल और उसका जवाब दोनों पढ़ लिया है, वे मुस्कुराकर बस इतना ही कह रहे है।अगर इसे क्रांतिकारी कदम कहा जा रहा है तो फिर साधारण कदम किसे कहा जाएगा।
भीड़ की गिनती और खबर की लंबाई
हाल ही में जिले में दो प्रदर्शन हुए और अब राजनीतिक गलियारों में दोनों की तुलना चाय की चुस्कियों के साथ बड़े चटखारे लेकर की जा रही है। एक तरफ जयस का प्रदर्शन था, दूसरी तरफ कांग्रेस का धरना। अब तुलना भी बड़ी दिलचस्प तरीके से की जा रही है। लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस के धरने में जहां गिनती मुश्किल से 50 तक पहुंच रही थी, वहीं जयस के प्रदर्शन में करीब दो हजार लोगों की भीड़ उमड़ आई थी, लेकिन असली चर्चा भीड़ की संख्या से ज्यादा उस कवरेज को लेकर हो रही है जो इन दोनों आयोजनों को मिला। इलाके में लोग पूछ रहे हैं कि अगर भीड़ के हिसाब से देखा जाए तो खबरों में जयस का प्रदर्शन ज्यादा सुर्खियों में होना चाहिए था। पर अखबारों और चर्चाओं में मामला कुछ उलटा ही नजर आया।
अब इस पर भी अलग-अलग तरह की राजनीतिक व्याख्याएं चल रही हैं। कोई कह रहा है कि पुरानी पार्टी का नेटवर्क काम आ गया, तो कोई इसे मीडिया की अपनी प्राथमिकता बता रहा है। वहीं कुछ लोग इसे सीधी भाषा में ‘राजनीतिक वजन’ का मामला भी बता रहे हैं। सियासी गलियारों में अब मजाक भी चल पड़ा है.राजनीति में सिर्फ भीड़ जुटाना ही काफी नहीं होता, खबर बनने के लिए ‘कनेक्शन’भी जरूरी होते हैं। वरना हजारों की भीड़ भी कभी-कभी खबर की दो लाइन में सिमट जाती है और पचास लोगों का धरना पन्ने भर की चर्चा बन जाता है।




