Betul News: शत्रु संपत्ति की फाइलों में दबे हैं राज! जांच की आहट से बढ़ी हलचल

खाली पड़ी जमीनों पर गिद्ध दृष्टि, रिकॉर्ड में नाम चढ़ाकर करोड़ों का खेल
Betul News: बैतूल। शहर में शत्रु संपत्ति की खोजबीन और रिकॉर्ड की पड़ताल की सुगबुगाहट ने उन लोगों ने उन लोगो के कान खड़े कर दिए है, जिनके जमीन संबंधी सौदों पर अब सवाल उठ रहे हैं। वर्षों पहले देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए लोगों की पीछे छूटी संपत्तियों को लेकर अब चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक, शहर के गौठाना से हमलापुर तक और जिला मुख्यालय से सटे ग्राम जामठी में ऐसी संपत्तियां होने की जानकारी सामने आई है, जिनके स्वामित्व और नामांतरण की जांच अब जरूरी मानी जा रही है। यदि प्रशासन पुराने खसरे, राजस्व रिकॉर्ड और नामांतरण की प्रक्रिया खंगालता है, तो जमीनों के कथित खेल की कई परतें खुल सकती हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने बंटवारे के बाद अपनी जमीनें छोड़कर पाकिस्तान की राह पकड़ ली थी। इसी का फायदा उठाते कथित तौर पर कुछ लोगों ने वर्षों पहले खाली छोड़ी गई जमीनों को सरकारी रिकार्ड में अपने नाम दर्ज कराने के बाद उनका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर दिया।
जानकारी मिली है कि कहीं जमीन पर मैरिज गार्डन विकसित किए गए, तो कहीं कॉलोनियों के लिए प्लॉट काटकर बेच दिए गए। हालांकि इन संपत्तियों के स्वामित्व और नामांतरण में अनियमितता के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में राजस्व रिकॉर्ड की जांच इस पूरे मामले में निर्णायक साबित हो सकती है।
लाखों खर्च कर मकान बनाने वालों पर भी मंडरा सकता है खतरा
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू उन आम नागरिकों से जुड़ा है, जिन्होंने मकान बनाये जाने के लिए और जमीन खरीदने के लिए लाखों रुपये खर्च किए और अपने आशियाने भी बना लिए। यदि जांच में किसी भूखंड का सरकारी नियंत्रण वाली शत्रु संपत्ति से संबंध सामने आता है और सौदे में गड़बड़ी प्रमाणित होती है, तो खरीदारों के सामने कानूनी और आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।
हालांकि, किसी संपत्ति पर कार्रवाई और खरीदारों के अधिकारों का निर्धारण संबंधित रिकॉर्ड, कानून और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।
पुराने दस्तावेज खोल सकते हैं राज, प्रशासन की जांच पर निगाहें
सूत्रों का दावा है कि कुछ जमीनों के संबंध में नाम और अन्य जानकारियां सामने आई हैं, जिनकी दस्तावेजों के आधार पर पड़ताल की जा सकती है। फिलहाल इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संबंधित जमीनें वास्तव में शत्रु संपत्ति की श्रेणी में आती हैं या नहीं, उनके रिकॉर्ड में बदलाव कब और किन दस्तावेजों के आधार पर किए गए तथा वर्तमान में उनका उपयोग कौन कर रहा है।
यदि प्रशासन पुराने राजस्व अभिलेखों, नामांतरण आदेशों और रजिस्ट्री दस्तावेजों का मिलान कर निष्पक्ष जांच करता है, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कहीं छोड़ी गई जमीनों के नाम पर नियमों को दरकिनार कर जमीनों का कारोबार तो नहीं खड़ा कर दिया गया?
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