Politics: राजनीतिक हलचल: प्रदेश पदाधिकारी की यह कैसी चतुर राजनीति?? इनकी धार्मिक यात्रा की क्या निकल रहे मायने??? आखिर फेसबुक की 1 पोस्ट पर क्यों मचा बवाल???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

प्रदेश पदाधिकारी की चतुर राजनीति
बैतूल की सियासत इन दिनों दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। विपक्षी पार्टी के भीतर चल रही खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा उस बड़बोले प्रदेश पदाधिकारी की है, जो अपने बयानों से सुर्खियां बटोरने में माहिर माने जाते हैं,लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर खेल किसके हाथ में है क्या जिला प्रमुख उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं, या फिर यह बड़बोला अल्पसंख्यक चेहरा ही पूरे जिले की सियासत की डोर खींच रहा है?
पार्टी के गलियारों में कानाफूसी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कहा जा रहा है कि यह महज बयानबाजी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि इस बड़बोले नेता के राजनीतिक गुरु ने पहले ही इशारा कर दिया था कि ‘छोटे खान’ का जो प्रशिक्षण है, उसमें असली कंट्रोल उसी के हाथ में रहेगा। यानी मंच पर भले कोई और दिखे, लेकिन पर्दे के पीछे से इशारे कहीं और से हो रहे हैं।अब सवाल यह उठता है कि जिला प्रमुख वाकई में नेतृत्व कर रहे हैं या फिर वे खुद एक बड़े खेल का हिस्सा बन चुके हैं?
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी यह असमंजस साफ दिखाई देता है किसकी लाइन पकड़ी जाए और किसकी बात को अंतिम माना जाए। कुल मिलाकर विपक्ष की यह अंदरूनी जंग सिर्फ पद और प्रभाव की नहीं, बल्कि नियंत्रण और भविष्य की राजनीति की लड़ाई बनती जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बयानवीर की गूंज ज्यादा भारी पड़ती है या जिला प्रमुख अपनी पकड़ मजबूत कर पाते हैं। फिलहाल तो सियासत का यह तडक़ा, चाय की हर चुस्की के साथ और भी चटपटा होता जा रहा है।
धार्मिक यात्रा के निकल रहे मायने
एक दल के प्रमुख की हालिया बगलामुखी धाम यात्रा अब सिर्फ धार्मिक आस्था का विषय नहीं रह गई, बल्कि इसके सियासी मायने भी खूब निकाले जा रहे हैं ।दरअसल, भले मानुष की छवि वाले ये नेताजी आमतौर पर बिना तामझाम और दिखावे की राजनीति के लिए जाने जाते हैं।
कार्यकर्ताओं के बीच उनकी सादगी और सीधी शैली ही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, लेकिन अचानक उनका बगलामुखी दरबार पहुंचकर विशेष अनुष्ठान करना, सियासी गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि बगलामुखी साधना को अक्सर ‘विजय और विरोधियों को शांत करने’ से जोडक़र देखा जाता है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह यात्रा महज व्यक्तिगत आस्था थी, या फिर इसके पीछे आने वाले चुनावी समीकरणों और अंदरूनी चुनौतियों की आहट छिपी है? पार्टी के भीतर भी इस यात्रा को लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ इसे नेताजी की निजी श्रद्धा बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक सोचा समझा सियासी संदेश मान रहे हैं।
कुल मिलाकर, ‘विशेष पूजा’ ने सियासत में नया तडक़ा लगा दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि यह आध्यात्मिक कदम नेताजी की राजनीतिक राह को कितना आसान बनाता है, या फिर यह चर्चा सिर्फ अटकलों तक ही सीमित रह जाती है। फिलहाल, राजनीति और धर्म के इस संगम की कार्यकर्ताओं के बीच खूब चर्चा है।
फेसबुक पोस्ट पर मचा बवाल
सारणी की सियासत में इन दिनों एक फेसबुक पोस्ट ने हलचल मचा दी है। एक स्थानीय पत्रकार की पोस्ट ने विपक्षी पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। पोस्ट के मुताबिक, अंजुमन कमेटी के महासचिव लगातार कांग्रेस में मुस्लिम वर्ग की आवाज बनकर सामने आ रहे हैं, लेकिन आरोप है कि जिलाध्यक्ष उनकी अनदेखी कर रहे हैं।
बात यहीं तक नहीं रुकी। मुस्लिम वर्ग की ओर से उन्हें हटाने की मांग तक हाईकमान पहुंचने की चर्चा है। इधर, सियासी गलियारों में असली तडक़ा तब लगा, जब ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष को उसी पदाधिकारी के साथ ‘फलों के रस’ का आनंद लेते देखा गया, जो खुलकर जिलाध्यक्ष के विरोध में खड़े हैं। इस तस्वीर और मुलाकात ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह महज संयोग है, या फिर जिले की राजनीति में अंदर ही अंदर कोई बड़ा खेल चल रहा है?
चर्चाएं तो यहां तक हैं कि कहीं ब्लॉक स्तर से ही जिलाध्यक्ष के खिलाफ मुस्लिम विरोधी खबरें प्लांट तो नहीं करवाई जा रहीं! कुल मिलाकर, एक फेसबुक पोस्ट ने विपक्ष की अंदरूनी सियासत को चटपटा बना दिया है। अब देखना होगा कि यह खलबली सिर्फ चर्चा तक सीमित रहती है या फिर संगठन में कोई बड़ा बदलाव लेकर आती है।
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