राजनितिक हलचल: ऐसा क्या हुआ कि 1 सामान्य घर बना गया राजनीति का आधार केन्द्र?? किस पार्टी के दावेदारों में चल रहा शह- मात का खेल??? बैतूल आए बड़े नेता के प्रचार के निर्देश आखिर कितने सार्थक हुए??? पढ़िए पूरी खबर हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……..

राजनीति का केंद्र बना एक सामान्य घर
वैसे राजनीति में रसूखदारों और पद पर रहने वाले लोगों के यहां विभिन्न दलों के पदाधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन हालिया सप्ताह में बिना किसी पद के एक दिवंगत और सक्रिय समाजसेवी के यहां एक बड़े नेता के आगमन को लेकर राजनीति गरम है। एक सत्तारूढ़ पार्टी और एक बड़े संगठन के बीच सेतू का काम करने वाले बड़े पदाधिकारी का बैतूल आगमन हुआ। वैसे उन्हें बैतूल में भाजपा के एक दिवंगत सांसद का काफी करीबी बताया जाता है। बैतूल से उनका स्नेह भी है, लेकिन वे यहां आए तो अपने दिवंगत समाजसेवी मित्र के सिविल लाइन आवास पर पहुंचे। यहां पर भोजन कर परिजनों के साथ आत्मीयता से लंबा समय बिताया, लेकिन न तो सत्ता और न ही संगठन के पदाधिकारियों से मुलाकात की। वे भारत भारती होते हुए भोपाल रवाना हो गए। इससे राजनीति में भी तरह-तरह की चर्चाएं चल पड़ी है।
दावेदारों की संख्या में अचानक इजाफा
सत्तारूढ़ पार्टी के संगठन चुनाव में लंबा वक्त है, फिर भी पद के लिए अभी से जिस तरह से लाबिंग चल रही है, इसे देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि जमकर घमासान मचेगा। इसकी शुरुआत भी हो गई है। कुछ जगह मंडल पदाधिकारियों के लिए जमकर घमासान मचा हुआ है। बिजली नगरी के नाम से महशूर शहर में संभावित दावेदारों ने एक दूसरे की अभी से टांग खींचना शुरू कर दी है। इनके काले-पीले कारनामे वरिष्ठ पदाधिकारियों को भेजकर दावेदारियों से दूर किया जा रहा है, लेकिन यह घमासान देखकर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी काफी चिंतित है कि यह स्थिति आगे निर्मित हुई तो पार्टी की जमकर किरकिरी होगी। इसके लिए संगठन के कुछ पदाधिकारियों और स्थानीय माननीय को भी दावेदारों को मुंह बंद रखने के लिए कहा गया है। उनके प्रयास भी शुरू हो गए हैं।
नेताजी के प्रयास कितने सार्थक
पिछले दिनों विपक्षी पार्टी के एक नेता प्रचार के लिए जाते समय बैतूल रूके। उन्होंने रात्रि विश्राम कर पार्टी के चुनिंदा लोगों से चर्चा की। अगले दिन फिर पदाधिकारियों में जान लाने के उद्देश्य से मुलाकात की। एक नेताजी के आवास पर जमकर फोटो सेशन चलते रहा। बड़े नेता ने भी किसी को निराश नहीं किया और परिचय प्राप्त कर फोटो सेशन कराया, लेकिन जैसे ही उन्होंने पड़ोसी जिले की एक विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में दायित्व सौंपे जाने की बात की, हमेशा की तरह कई लोग नौ-दो ग्यारह हो गए। हालांकि अभी जिम्मेदारी नहीं दी गई। यदि उपचुनाव में प्रचार का जिम्मा दिया तो जेब से पैसे निकालकर दुबले पर दो असाढ़ की कहावत होने के पहले ही कुछ लोग अपना नाम प्रचार की सूची से गायब करने प्रयास शुरू कर गए।




