Betul Politics News: डीडी मजबूरी या जरूरी? दूसरी पारी खेली तो फिर बढ़ेेगा राजनैतिक कद
Betul Politics News: DD compulsion or necessary? If second innings is played then political stature will increase.

Betul Politics News:(बैतूल)। शीर्षक पढ़कर राजनैतिक जानकारों का चौकना लाजिमी है, लेकिन हकीकत है कि बैतूल में इन दिनों भाजपा द्वारा लगातार दूसरी बार बनाए गए डीडी उइके को लेकर इस बात की खासी चर्चा चल रही है। दरअसल भाजपा में जिस तरह नया उम्मीदवारों को मौका देने की परंपरा चली आ रही है, इससे कुछ दिनों पहले तक बैतूल-हरदा-हरसूद संसदीय क्षेत्र से किसी महिला उम्मीदवार या किसी नए चेहरे पर भाजपा द्वारा दाव लगाना तय माना जा रहा था, लेकिन निवर्तमान सांसद डीडी उइके पर दूसरी बार दाव लगाकर भाजपा संगठन ने साफ कर दिया है कि बैतूल में किसी तरह की बदलाव की गुंजाइश नहीं थी।
अब उइके को बदलने की बात पर चर्चा छिड़ी है कि पांच वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने संसदीय क्षेत्र को उन्होंने कोई बड़ी उपलब्धि नहीं दिलाई। जो काम स्वीकृत हुए वही बैतूल की जरूरत थी या फिर सामूहिक प्रयासों से स्वीकृत हुए। कहा तो यह भी जा रहा है कि सांसद उइके के पांच वर्ष के कार्यकाल में केवल वंदे भारत एक्सप्रेस के अलावा दूसरी ट्रेनों का स्टापेज नहीं हो पाया। चाहे बैतूल की बात करें या मुलताई या फिर आमला की। सभी स्टेशनों पर ट्रेनों के स्टापेज की मांग को लेकर लंबे समय से मांग की जा रही है। कुछ ट्रेनें जरूर जिले के स्टेशनों पर रूकी है, लेकिन लोग इसका श्रेय भी रेलवे सलाहकार समिति के सदस्यों को दे रहे हैं। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो आंकलन करने वाले ही जाने, लेकिन उइके के पांच वर्ष के कार्यकाल में मीन-मेख निकालने वालों की कमी नहीं है।
डीडी के पक्ष में सकारात्मक पहलू यह भी
यदि सांसद के पांच वर्ष के कार्यकाल पर नजर दौड़ाए तो सुरक्षित सीट होने के बाद वे अल्प समय में एक आवाज बनकर उभरे हैं। दरअसल पूर्व सांसद ज्योति धुर्वे के दो कार्यकाल में लोगों ने उन्हें लोकसभा के चैनल पर संसदीय क्षेत्र की समस्याओं को उठाते यदा-कदा ही देखा लेकिन गुरुजी के नाम से फेमस डीडी ने अपने शिक्षकीय कार्यकाल में हासिल की विद्वता, ज्ञान के अपार भंडार को राजनीति के मैदान में ब्रह्मास्त्र के रूप में उपयोग किया। उन्होंने ओजस्वी वक्ता के रूप में संसद में एक नहीं कई मर्तबा जिले की समस्याओं को पुरजोर ढंग से उठाया। एक वक्ता के रूप में उन्होंने पांच वर्ष में संसद में एक अलग छाप छोड़ी। नतीजा यह निकला कि उन्हें एक नहीं बल्कि संसद की चार समितियों का सदस्य बनाया गया।
पूर्व सांसद ज्योति धुर्वे की अपेक्षा उइके ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में सांसद निधि खर्च करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। लोगों के सुख-दुख में शामिल होकर संसदीय क्षेत्र का दौरा कर अपनी सक्रियता का भी परिचय दिया। बस यही वजह है कि उनकी टिकट पर मोहर लगना पहले ही तय था। भले ही भाजपा की पैनल में तीन से पांच नाम गए हो, इसलिए कहा जा सकता है कि भाजपा के लिए डीडी ही जरूरी थे। दूसरी एक और बात उनके पक्ष में गई की अपनी सक्रियता के साथ उन्होंने पांच वर्ष के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कई बार मुलाकात की। उन्होंने अपने प्रखर वक्ता होने की पहचान के रूप में पीएम मोदी को स्व लिखित पुस्तक भी भेंट की। इससे उनका पक्ष और मजबूत हो गया। बची कसर संसदीय क्षेत्र के 6 विधायकों द्वारा उनके नामों का समर्थन करने पर पूरी हो गई।
टिकट तय हुई तो विरोधी भी पक्ष में
राजनीति में यह बात बड़े आसानी से समझी जा सकती है कि मतभेद और मनभेद होने में समय नहीं लगता। पूर्व के चुनाव में टिकट मिलने के बाद श्री उइके के बारे में कहा जाता था कि वे जिले के एक भाजपा गुट से जुड़े हैं, लेकिन सांसद बनने के बाद उन्होंने यह बात सिरे से खारिज कर दी। उन्होंने सबको सम्मान दिया। यही वजह है कि अपनी आत्मीयता के बलबुत्ते पर उन्होंने छोटे से लेकर बड़े और विरोधियों को भी आसानी से साध लिया। राजनीति का दूसरा पहलू यह है कि उन्हें फिर एक और पारी खेलने के लिए पार्टी ने उम्मीदवार बनाया तो बधाई देने वालों में ऐसे भी लोग उनके करीब देखे गए जो सबको साथ लेकर चलने के दौरान दूरियां बना बैठे थे, लेकिन इन्हें भी अगले पांच वर्षों की याद आई और डीडी जरूरी है के स्लोगन पर इनकी भी मोहर लग गई।





