प्रशासनिक कोना: सड़क निर्माण की अनियमितता की जांच आखिर किस अधिकारी ने दबाई?? कौनसे साहब डिनर- लंच के लिए सुर्खियां बटोर रहे???? इन साहब के साथ आखिर क्यों हो रहा 2 माह से अन्याय???? विस्तार से पढ़िए पूरी खबर हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…….

आखिर जांच रिपोर्ट किसने दबाई
शहर में सड़कों की जांच रिपोर्ट को लेकर अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। कहने को तो दो शासकीय विभागों के बीच का मामला है, लेकिन इनमें बड़े अधिकारियों के आदेशों का भी खुला उल्लंघन हुआ है। माननीय के निर्देश पर शहर की घटिया सड़कों को खोदकर जांच की गई थी। निर्माण कार्य से जुड़ी एक मैडम के अधीनस्थ अमले ने अलग-अलग जगह सड़क खोदकर नमूना लिया। तीन माह बीतने के बाद इस नमूने को सार्वजनिक नहीं किया।
हालात यह है कि रिपोर्ट के लिए शीर्ष अधिकारी भी जवाब मांग रहे हैं, लेकिन मैडम सब पर भारी पड़ रही है और आज तक रिपोर्ट दबाकर बैठी है। चर्चा है कि रिपोर्ट में ऐसा क्या सामने आ गया जो सार्वजनिक करने से परहेज की जा रही है। दूसरी चर्चा यह भी हो रही है कि ठेकेदार पर कार्रवाई से नुकसान न हो जाए, इसलिए सारा मामला दबाकर बैठे हैं।
साहब की डिनर-लंच पार्टी चर्चा में
एक यूनिफॉर्म वाले बड़े साहब की डिनर-लंच पार्टी इन दिनों खासी सुर्खियां बंटोर रही है। वैसे अधिकारियों की डिनर-लंच पार्टी कोई मायने नहीं रखती, लेकिन साहब लीग से हटकर ऐसे लोगों के यहां पर भी डिनर-लंच पर जा रहे है, जो शहर में विवादों का केन्द्र बने हुए है। साहब कहने को तो अपने आप को स्वच्छ छवि का बताते आ रहे है, परन्तु अधीनस्थ उनकी इस बात पर एक प्रतिशत भी यकीन नहीं करते। अधीनस्थों की यह बात भी 100 टके सही कही जा सकती है।
दरअसल, साहब अपने पद के हिसाब से कोई काम नहीं करते। इसकी बानगी कई छुटभैयों को मुंह लगाकर घंटों बतियाना साहब की आदत में शुमार हो गया है। ऐसे में साहब की विवादित लोगों के यहां डिनर-लंच पार्टी के भी कहीं ना कहीं मायने निकाले जा रहे है। खबर है कि साहब की इस आदत की जानकारी हाल ही में एक दिग्गज जनप्रतिनिधि को भी लग गई है। देखना यह है कि इस मामले में क्या नया गुल खिलता है।
इनके साथ कैसा न्याय
एक निकाय के एक अधिकारी के साथ इन दिनों खूब अन्याय हो रहा है। साहब को बिना पदस्थापना के रूखसत कर दिया। इसके बदले उन्हें नई जगह पदस्थापना तक नहीं मिल पाई। हालत यह है कि दो माह में उन्हें बमुश्किल वेतन मिल पा रहा है, लेकिन पुराने बंगले पर से कर्मचारियों की छटनी के बाद उनकी स्थिति काफी खराब होते जा रही है।
उनके स्थान पर जिसकी पदस्थापना की है, उन्होंने आनन-फानन में पहले ही चार्ज ले लिया, लेकिन उन्हें नई पदस्थापना नहीं मिलने से भोपाल तक की कई बार दौड़ लगाने के बावजूद भी हताशा हाथ लगी है। बेचारे साहब थोड़ी सख्ती और पार्षदों के काम कर जनप्रतिनिधियों के निशाने पर आ गए, अन्यथा संभावना थी कि वे तीन साल की पूरी पारी जिले में खेलने वाले थे। फिलहाल वे जिस दौर से गुजर रहे है, काफी परेशान दिखाई दे रहे है। ऐसे में उनके करीबी भी साथ छोड़ चुके है।




