Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: साहब की अच्छी सोच पर कौनसी मैडम फेर रही पानी?? जांच के घेरे में थानेदार साहब, फिर भी मलाईदार थाने की कमाई क्यों??? किस कॉलेज में चल रहा लेब असिस्टेंट और सहायक प्राध्यापक के बीच ईलू-ईलू???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..

साहब की सोच पर मैडम फेर रही पानी
एक राजस्व अधिकारी ने जनता की सुनवाई के लिए ग्राउंड फ्लोर पर अलग से चेंबर बनवा दिया है। व्यवस्था यह है कि साहब की गैरमौजूदगी में भी एक तहसीलदार यहां बैठकर लोगों की समस्याएं सुनेंगे। मंशा अच्छी है, लेकिन सवाल यह है कि जिनकी परेशानी की वजह खुद तहसीलदार साहब हों, वे अपनी फरियाद लेकर आखिर किस दरवाजे पर दस्तक देंगे? साहब की सोच है कि उनकी अनुपस्थिति में जनता को भटकना नहीं पड़ेगा।
मगर जनता का असली सवाल यह है कि जब सुनवाई करने वाले से ही शिकायत हो, तब न्याय की उम्मीद किससे की जाए? चेंबर तो बन गया, लेकिन शिकायतों के समाधान का रास्ता अब भी साफ नहीं है। वैसे चर्चाएं तो यह भी हैं कि यहां पूरा सिस्टम ही पटरी से उतर चुका है।
ऐसे में नई व्यवस्था पर भरोसा जमने से पहले पुराने सवालों के जवाब जरूरी हैं। आखिर सरकारी दफ्तरों में सिर्फ कमरे और कुर्सियां बढ़ाने से व्यवस्था नहीं सुधरती। जनता को चेंबर नहीं, निष्पक्ष सुनवाई चाहिए। वरना नई व्यवस्था भी ‘सुनवाई का चेंबर, लेकिन फरियाद जाए तो जाए कहांÓ वाली कहावत को चरितार्थ कर सकती है।
जांच के घेरे में साहब, फिर भी मलाईदार थाने की कमान!
पुलिस महकमे में इन दिनों एक थाना प्रभारी की पोस्टिंग को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। बताते हैं कि साहब के खिलाफ गंभीर शिकायत की जांच चल रही है, लेकिन जांच पूरी होने और शिकायत के तथ्यों पर स्थिति स्पष्ट होने से पहले ही उन्हें फोरलेन से लगे एक मलाईदार थाने की कमान सौंप दी गई। अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या मेहरबानी हुई कि लाइन से सीधे थाने तक का सफर इतनी आसानी से तय हो गया?
चर्चाएं तो यह भी हैं कि थाने की कुर्सी तक पहुंचने की राह में शाम की बैठकों में खंबे की सेवा नियमित रूप से होती रही। अब जब शिकायतकर्ता जांच की प्रगति पर सवाल उठा रहा है, तो जांचकर्ता अधिकारी की कथित टालमटोल ने संदेह को और हवा दे दी है। इसी के साथ महकमे में कानाफूसी शुरू हो गई है कि कहीं खंबे की सेवा के साथ लिफाफे का वजन भी तो भारी नहीं पड़ गया? हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है कि जांच निष्पक्ष होगी या मलाईदार पोस्टिंग के आगे शिकायत ही ठंडी पड़ जाएगी?
लेब असिस्टेंट और सहायक प्राध्यापक का ‘इलू-इलू!
जिले के एक प्रमुख कॉलेज में इन दिनों पढ़ाई से ज्यादा दो कर्मचारियों की कथित नजदीकियों के चर्चे सुर्खियां बटोर रहे हैं। मामला एक लेब असिस्टेंट और एक विभाग की सहायक प्राध्यापक से जुड़ा बताया जा रहा है। कॉलेज के गलियारों में चल रही चर्चाओं की मानें तो मौका मिलते ही दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगती हैं। अब इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है, यह तो संबंधित लोग ही जानें, लेकिन किस्से हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे।
बताते हैं कि लेब असिस्टेंट खुद को कुछ ज्यादा ही स्मार्ट समझते हैं, वहीं मैडम भी किसी से कम नहीं बताई जा रहीं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों के शादीशुदा होने की चर्चा भी इस पूरे मामले को और चटखारेदार बना रही है। अब सवाल यह है कि कॉलेज आखिर शिक्षा का मंदिर है या निजी मेल-मिलाप का ठिकाना? यदि चर्चाओं में दम है, तो प्रबंधन को मामले की निष्पक्ष पड़ताल करनी चाहिए, ताकि परिसर की गरिमा और विद्यार्थियों के बीच संस्थान की छवि पर कोई आंच न आए। आखिर, कॉलेज में ‘इलू-इलूÓ से ज्यादा जरूरी पढ़ाई का ‘सिलेबसÓ है!
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