Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: किस मैडम की कुर्सी गई तो पुराने साहब पर फोड़ा ठीकरा?? आखरी पारी में थानेदार साहब का क्या चल रहा गणित??? आखिर बड़े साहब की ढील से सिस्टम क्यों हो रहा बेपटरी???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..

कुर्सी गई तो पुराने साहब पर फोड़ा ठीकरा!
प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक कथित जांच रिपोर्ट की गूंज सुनाई दे रही है। जमीन से जुड़े मामले में रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाली मैडम अब खुद सवालों के घेरे में होने की चर्चाओं के बीच तबादले के बाद रुखसत हो गईं। चर्चा है कि जाते-जाते उन्होंने पुराने बड़े साहब की भूमिका का जिक्र कर अपनी जिम्मेदारी का बोझ हल्का करने की कोशिश की। कथित तौर पर रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करवाने के लिए उन्हीं के निर्देशों का हवाला दिया जा रहा है।
अब गलियारों में सवाल तैर रहा है कि साहब के आदेश पर दस्तखत हुए थे, तो कलम किसकी थी और जवाबदेही किसकी बनेगी? प्रशासन में मौखिक आदेशों की आड़ लेना कोई नई बात नहीं, लेकिन जब मामला जमीन और जांच रिपोर्ट का हो, तो फाइल के पन्ने भी गवाही मांगते हैं। मैडम के जाने के बाद मामला शांत होगा या फाइल नए सवाल खोलेगी, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल साहब और मैडम के बीच जिम्मेदारी की गेंद किसके पाले में जाती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
आखिरी पारी में थानेदार की कमाई का गजब गणित!
मुख्यालय के नजदीक वाले थाने में इन दिनों साहब की कार्यशैली को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुर्सी पर बैठकर कानून का हिसाब रखने वाले थानेदार साहब अब खुद रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े हैं। क्षेत्र में जुए-सट्टे की गतिविधियों को लेकर उनकी कथित अनदेखी के किस्से गलियारों में तैर रहे हैं। कप्तान की चेतावनी का असर भी यदि कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाता है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सख्ती की चाबी किसके पास है? चर्चाएं तो यहां तक हैं कि साहब का पूरा ध्यान आखिरी पारी का हिसाब-किताब दुरुस्त करने पर है।
मानो सोच यही हो कि नौकरी की गाड़ी जब अंतिम स्टेशन की ओर बढ़ ही रही है, तो जितना समेट सकते हैं, समेट लो! अब देखने वाली बात यह है कि कप्तान की नजर इस थाने पर कितनी देर टिकती है और रिटायरमेंट से पहले साहब की कार्यशैली पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या मामला चर्चाओं में ही दफन हो जाता है।
बड़े साहब की ढील, चाटुकारों की मौज और सिस्टम बेपटरी
जिले के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों कामकाज से ज्यादा साहब को खुश रखने की कला के चर्चे हैं। बड़े साहब से उम्मीद थी कि प्रशासनिक मशीनरी को रफ्तार देंगे, लेकिन आरोप-चर्चाओं के बीच तस्वीर कुछ उलट नजर आ रही है। कुछ अफसर मूल काम पर ध्यान देने के बजाय चाटुकारिता में ज्यादा ऊर्जा खपाते दिख रहे हैं। नतीजा यह कि फाइलों की चाल सुस्त और व्यवस्था की रफ्तार पस्त होने की बातें सामने आ रही हैं। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि कुछ मामलों में जनप्रतिनिधियों की नाराजगी भी सामने आ चुकी है।
जब जनता के काम अटकें और जनप्रतिनिधियों को भी असंतोष जताना पड़े, तो समझिए सिस्टम की ट्यूनिंग में कहीं न कहीं गड़बड़ी है। सवाल यह है कि साहब को जमीनी हकीकत बताने वाले कितने हैं और वाहवाही के पुल बांधने वालों की कतार कितनी लंबी? प्रशासन आखिर तारीफों से नहीं, नतीजों से चलता है। अब देखना यह है कि बड़े साहब व्यवस्था की पटरी दुरुस्त करते हैं या चाटुकारिता एक्सप्रेस यूं ही फर्राटे भरती रहती है।
हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें
👇https://chat.whatsapp.com/KWRuTRhIWoXDiwhdwiCm29?mode=gi_t
बैतूल जिले की ताजा खबरें (Hindi News Madhyapradesh) अब हिंदी में पढ़ें| Trending और Viral खबरों के लिए जुड़े रहे snewstimes.com से| आज की ताजा खबरों (Latest Hindi News) के लिए सर्च करें snewstimes.com




