Politics: राजनीतिक हलचल: सात हजार की सवारी और छात्र खोजता रहा प्रदर्शन का आखिर क्या माजरा है?? दाल नहीं गली तो पुराने खूंटे की ओर किसकी नजर??? प्रथम नागरिक आखिर क्यों बनते जा उनकी ही पार्टी के लिए सिरदर्द???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

सात हजार की सवारी और छात्र खोजता रहा प्रदर्शन!
सियासत में भीड़ जुटाना भी अब बाकायदा मैनेजमेंट का विषय हो गया है। हाल ही में एक पार्टी के छात्र संगठन ने प्रदर्शन का बिगुल बजाया तो उम्मीद थी कि छात्र बड़ी संख्या में जुटेंगे, लेकिन मैदान में नजारा कुछ और ही था। छात्र कम और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी ज्यादा नजर आए। यानी प्रदर्शन छात्र संगठन का था, कमान पार्टी के नेताओं के हाथ में! अब पार्टी के भीतर की चर्चाओं पर भरोसा करें तो एक गाड़ी के लिए सात हजार रुपए तक का इंतजाम था।
बावजूद छात्र अपेक्षित संख्या में नहीं पहुंचे। पद से हटाए गए छात्र संगठन के पूर्व प्रमुख और उनके करीबी युवा नेता अब चौक-चौराहों पर यही किस्सा सुना रहे हैं। हालांकि यह दावा फिलहाल चर्चा तक ही सीमित है, लेकिन राजनीति में चर्चा भी कभी-कभी बहुत कुछ कह जाती है। मजेदार बात यह कि जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन का ऐलान हुआ था, वे मौके पर पहुंचते-पहुंचते औपचारिकता में बदल गए।
पार्टी प्रमुख खुद मीडिया और अधिकारियों से चर्चा करते नजर आए। ऐसे में गलियारों में सवाल तैर रहा है। जब बात अधिकारियों की टेबल पर ही सुलझनी थी, तो सड़क पर प्रदर्शन का मंच क्यों सजाया? और जब छात्र संगठन का आंदोलन था, तो छात्र आखिर नजर क्यों नहीं आए? लगता है इस बार भीड़ का बजट तो बना, लेकिन भीड़ का गणित बिगड़ गया!
दाल नहीं गली तो पुराने खूंटे की ओर नजर!
राजनीति में रिश्ते भी मौसम की तरह बदलते रहते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के करीब माने जाने वाले एक वरिष्ठ नेता और उनके पुत्र इन दिनों विपक्षी खेमे से नजदीकी बढ़ाते नजर आ रहे हैं। बहाना बना सामाजिक सम्मेलन का और मंच ऐसा सजा कि सियासी संदेश अपने आप पढ़ा जाने लगा। अपने समाज की बहुसंख्यक आबादी वाले एक नगर में सम्मेलन की अध्यक्षता विपक्षी खेमे के नेता से करवाना अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है।
मंच पर सामाजिक आयोजन था, लेकिन निगाहें सियासी गणित तलाशती रहीं। आखिर अध्यक्षता के लिए विपक्षी खेमे का ही चेहरा क्यों? चर्चा करने वालों का कहना है कि सत्तारूढ़ दल में अपेक्षित तवज्जो न मिलने और दाल न गलने से नाराजगी बढ़ रही है।
ऐसे में पुराने सामाजिक-सियासी रिश्तों को फिर से गर्माने की कोशिश मानी जा रही है। हालांकि संबंधित पक्ष इसे महज सामाजिक आयोजन बता सकता है, लेकिन राजनीति में मंच, मेहमान और अध्यक्षता तीनों का अपना संदेश होता है। अब चौक-चौराहों की भाषा में कहें तो गाय को नया खूंटा रास नहीं आया, तो गर्दन फिर पुराने खूंटे की तरफ घूम गई है। सवाल सिर्फ इतना है कि यह महज सामाजिक मेल-मिलाप है या आने वाले दिनों के सियासी समीकरणों की पहली आहट?
प्रथम नागरिक बने पार्टी के लिए ‘सिरदर्द!
सत्ता में आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, कभी-कभी अपने ही ‘प्रथम नागरिकÓ बन जाते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ नगरीय निकायों के प्रथम नागरिक इन दिनों पार्टी के लिए ऐसी ही परेशानी खड़ी करते नजर आ रहे हैं। कहीं अध्यक्ष की मेज पर फाइलों का सफर थम गया है तो कहीं प्रथम नागरिक की निजी व्यस्तताओं ने पार्टी की किरकिरी का इंतजाम कर दिया है।
मुख्यालय वाली एक प्रमुख नगरीय संस्था में फाइलों के अटकने की चर्चा है। कामकाज की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं और इसका असर सीधे पार्टी की छवि पर पड़ रहा है। दूसरी ओर एक अन्य प्रमुख निकाय में प्रथम नागरिक की गैरमौजूदगी और निजी व्यस्तताओं को लेकर कार्यकर्ताओं में कानाफूसी चल रही है। सवाल यह कि जब जनता ने जिम्मेदारी सौंपी है तो प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए?
तीसरा मामला तो और दिलचस्प है। निर्दलीय चुनाव जीतकर सत्तारूढ़ दल में आए और फिर मंडल अध्यक्ष से सीधे प्रथम नागरिक की कुर्सी तक पहुंचे नेताजी इन दिनों न फोन उठाते दिख रहे हैं, न अपने क्षेत्र में सक्रिय।
कार्यकर्ता संपर्क साधें तो जवाब का इंतजार ही करते रह जाएं। अब पार्टी के भीतर सवाल उठ रहा है कुर्सी तो मिल गई, लेकिन क्या जिम्मेदारी भी याद है? क्योंकि प्रथम नागरिक की निष्क्रियता अगर लंबी चली तो इसका खामियाजा पार्टी को आने वाले चुनावी समीकरणों में भुगतना पड़ सकता है।
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