Betul Aviadh Katai : पहली कटाई दबाने की कोशिश के बीच 18 और 20 अगस्त की रात फिर चले आरे
आरोपी और लकड़ी विभाग की पकड़ से बाहर, ताप्ती रेंज में 10 दिन में तीन जगह कटाई

Betul Aviadh Katai : बैतूल। दक्षिण वन मंडल की ताप्ती रेंज में वन संपदा की सुरक्षा को लेकर वन अधिकारियों की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार महज 10 दिनों के भीतर रेंज में चार अलग-अलग स्थानों पर सागौन के पेड़ों की कटाई की घटनाएं सामने आई हैं। खास बात यह है कि पहली घटना के बाद यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जाती तो संभवत: बाद की दो घटनाओं को रोका जा सकता था, लेकिन कार्रवाई के बजाय मामले को दबाने के प्रयास किए जाने की चर्चाएं अब विभागीय गलियारों में ही जोर पकड़ रही हैं।
सूत्रों के मुताबिक ताप्ती रेंज में पहली कटाई 10 अगस्त की रात को गौनीघाट में हुई थी। बड़े पैमाने पर कटाई के बावजूद मामले में अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई गई। सूत्रों का दावा है कि मामला सामने आते ही रेंजर दयानंद डेहरिया की ओर से इसे दबाने के भरपूर प्रयास किए गए, लेकिन दो कटाई और होने से मामला बाहर आ गया।
कार्रवाई नहीं हुई तो माफियाओं ने फिर दी चुनौती
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अधिकारियों ने जब मामले को हल्के में लिया तो पहली घटना के बाद वन माफियाओं के हौसले बढ़ गए। 18 अगस्त की रात माफियाओं ने कोटमी और डोक्या कि सीमा पर कम्पार्टमेंट नम्बर 836 में सागौन पेड़ो पर फिर आरे चला दिए, हद तो तब हो गई जब 20 अगस्त की रात को कोल्हू ढाना में भी सागौन पेड़ों की कटाई कर दी गई। इस तरह महज दस दिनों के भीतर तीन स्थानों पर कटाई की घटनाएं सामने आने से वन सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह भी है कि पहली घटना की सूचना अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद आखिर अवैध कटाई करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
बैतूल-हरदा सीमा से जुड़े माफियाओं पर शक
सूत्र बताते हैं कि कटाई की इन घटनाओं के पीछे बैतूल और हरदा जिले की सीमा से सटे ग्रामों में सक्रिय वन माफियाओं का हाथ होने की आशंका है। हालांकि अभी तक विभाग आरोपियों तक नहीं पहुंच सका है। यही नहीं, कटे हुए सागौन की जब्ती भी नहीं हो पाई है। इससे विभाग की जांच और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल और गहरे हो गए हैं। बताया जा रहा है कि पूरे मामले को दबाने के प्रयास किए जा रहे हैं और अधिकारियों की दिलचस्पी भी अपेक्षाकृत कम ही नजर आ रही है।
विभागीय स्तर पर इस बात की चर्चा है कि यदि वर्तमान डीएफओ के स्थान पर पूर्व डीएफओ विजयानंतम टीआर होते तो अब तक जिम्मेदार रेंजर पर कार्रवाई हो चुकी होती और आरोपी व सागौन भी वन विभाग के कब्जे में होते। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लगातार हो रही कटाई के बीच अब सवाल यह है कि वन विभाग कब तक केवल घटनाओं की जानकारी जुटाता रहेगा और कब वास्तविक आरोपियों तक पहुंचकर वन संपदा की लूट पर अंकुश लगाएगा?
खास बात यह है कि जांच कहां तक पहुंची, आरोपी चिन्हित हुए या नहीं, लकड़ी जब्त हुई या नहीं, जांच दल में किन अधिकारियों को शामिल किया गया, इन तमाम सवालों के जवाब लेने के लिए डीएफओ अरिहंत कोचर, रेंजर दयानंद डेहरिया से लगातार सम्पर्क करने के प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन कोई भी अधिकारी अपना पक्ष रखने को तैयार नहीं है।




