Betul News: ढाई एकड़ में तैयार होगा घना जंगल, 46 लाख की मियावाकी परियोजना पर अमल

अब सिर्फ पौधरोपण नहीं, पूरा
कढ़ाई में जंगल तैयार करने की तैयारी; 15 हजार पौधे लगेंगे एक साथ
Betul News: बैतूल। शहर के आसपास हरियाली बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा देने के उद्देश्य से नगर पालिका बैतूल द्वारा मियावाकी पद्धति से बड़े स्तर पर पौधरोपण की तैयारी की जा रही है। कलेक्टर डॉ सौरभ संजय सोनवणे के मार्गदर्शन में ग्राम कढ़ाई के समीप करीब ढाई एकड़ भूमि का चयन किया गया है, जहां 15 हजार पौधे लगाए जाएंगे। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए नगर पालिका द्वारा लगभग 46 लाख के टेंडर जारी किए जा रहे हैं।
नगर पालिका अधिकारियों के अनुसार यह केवल पौधरोपण तक सीमित योजना नहीं होगी, बल्कि पौधों के विकसित होकर घने जंगल का स्वरूप लेने तक उनकी सुरक्षा, सिंचाई और रखरखाव की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। इससे पौधरोपण के बाद पौधों के नष्ट होने की समस्या काफी हद तक समाप्त होने की उम्मीद है।
आम तौर पर अभी तक पौधों का रोपण तो बड़े स्तर पर किया जाता रहा, लेकिन इन पौधों को सहेजने का मामला अक्सर ठंडे बस्ते में ही जाता रहा। लेकिन दावा है कि, नपा का यह प्रयास रंग तो लाएगा ही बल्कि इसके परिणाम धरातल पर भी नजर आएंगे।
नीम, पीपल, बरगद समेत देशी प्रजातियों को मिलेगी प्राथमिकता
नगर पालिका सीएमओ नवनीत पांडे ने बताया कि मियावाकी तकनीक के तहत क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल देशी प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे। इनमें नीम, पीपल, बरगद सहित अन्य तेजी से विकसित होने वाले वृक्ष शामिल हैं। परियोजना के अंतर्गत पौधों की सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, खाद की व्यवस्था और कर्मचारियों की तैनाती जैसी जिम्मेदारियां भी ठेकेदार को निभानी होंगी।
उन्होंने बताया कि बाजार में जिन पौधों की कीमत 40 से 50 रुपए तक होती है, उन्हें बड़े स्तर पर खरीदी के कारण लगभग 13 से 14 रुपये प्रति पौधे की लागत में लगाया जा सकेगा। नगर पालिका भविष्य में इसी पद्धति से लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में और पौधरोपण करने की योजना पर भी काम कर रही है।
क्या है मियावाकी पद्धति, क्यों मानी जाती है खास?
दरअसल मियावाकी पद्धति जापान के प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई वृक्षारोपण तकनीक है। इसका उद्देश्य कम क्षेत्र में अत्यधिक घनत्व के साथ देशी प्रजातियों के पौधे लगाकर कम समय में प्राकृतिक जंगल तैयार करना है। इस विधि में मिट्टी को लगभग एक मीटर गहराई तक तैयार किया जाता है तथा उसमें जैविक खाद, भूसा और अन्य कार्बनिक तत्व मिलाए जाते हैं।
प्रति वर्गमीटर तीन से चार पौधे लगाए जाते हैं, जिससे पौधों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और उनकी वृद्धि सामान्य पौधरोपण की तुलना में कई गुना तेज होती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे जंगल पारंपरिक वनों की तुलना में लगभग 30 गुना अधिक घने और पौधों की वृद्धि 10 गुना तेज होती है। यदि यह योजना सफल रही तो आने वाले कुछ वर्षों में कढ़ाई क्षेत्र में एक घना हरित वन विकसित होगा, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा बल्कि बैतूल को हरियाली और जैव विविधता के नए केंद्र के रूप में भी स्थापित कर सकता है।
इनका कहना….
कलेक्टर के मार्गदर्शन में जमीन चिन्हित कर ली गई है। 46 लाख रुपए के टेंडर भी कॉल किये जा रहे हैं। मियावाकी पद्धति से किया जाने वाला पौधरोपण निश्चित ही पर्यावरण के लिए मील का पत्थर साबित होगा। आम नागरिकों को इसका लाभ भी मिलेगा।
नवनीत पांडेय, सीएमओ नपा बैतूल




