Betul News: मतभेद मिटा कर मनभेद छोड़ गए पीसीसी चीफ

Betul News: PCC chief left behind the differences after clearing the differences

कांग्रेस में गुटबाजी पर पटवारी की पहल: कितनी सफल, कितनी असफल

Betul News: बैतूल (सत्येंद्र सिंह परिहार)। मध्यप्रदेश कांग्रेस संगठन के सृजन अभियान के अंतर्गत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का एक दिवसीय बैतूल प्रवास राजनीतिक हलकों में काफी अहम रहा है । इस दौरान वे न सिर्फ संगठनात्मक गतिविधियों पर नजर रखते रहे, बल्कि उन्होंने जिले में लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी को समाप्त करने की दिशा में भी एक प्रतीकात्मक मगर महत्वपूर्ण पहल की।

जिले के तीन प्रमुख गुटों के नेताओं पूर्व मंत्री सुखदेव पांसे, जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष हेमन्त वागद्रे और पूर्व विधायक को मंच पर एक साथ लाना, एक-दूसरे से गले मिलवाना और संगठन पहले का संदेश देना निश्चय ही एक सकारात्मक प्रयास माना जा सकता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल गले मिल लेने से कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी खत्म हो जाएगी? क्या नेताओं के बीच मंच पर मुस्कानें और आलिंगन उन अंदरूनी मनभेदों को पिघला पाएंगे जो वर्षों से संगठन को भीतर ही भीतर खोखला कर रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल – क्या यह कोशिश जमीन स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं में कोई विश्वास जगा पाएगी? यह जरूरी नहीं कि इन तीन नेताओं के गले मिलने और मतभेद मिटाने की पहल आम कार्यकर्ता के गले उतर ही जाएगी।

गुटबाजी की जड़ों में झांकना भूल गए पटवारी

बैतूल जिले की राजनीति में कांग्रेस की गुटबाजी कोई नया विषय नहीं है। यह दशकों पुराना वह नासूर है, जिसने हर चुनाव में पार्टी को पीछे धकेला है। जिले की सभी पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हार और भाजपा का कब्जा इसी आंतरिक बिखराव की उपज है। यहां का हर कार्यकर्ता जानता है कि टिकट वितरण से लेकर धरना-प्रदर्शन तक, हर गतिविधि गुटीय संतुलन से संचालित होती है। पटवारी ने भले ही मंच से एकजुटता का नारा दिया हो, लेकिन इससे पहले भी कांग्रेस ने कई बार ऐसे नाटकीय मेल-मिलाप के दृश्य रचे हैं।

परिणाम सामने हैं संगठन कमजोर, कार्यकर्ता हतोत्साहित और मतदाता भ्रमित। राजनीतिक विश्लेषक भी यह मान रहे हैं कि अल्प समय के लिए आयोजित कार्यक्रम के दौरान तीनों नेताओं को गले मिलवाने से यह समझ लेना कि गुटबाजी खत्म हो गयी काफी नहीं है। जरूरत यह समझने की है कि आखिर गुटबाजी की यह पौध कहां उग रही है। कांग्रेस के भीतर वे कौन लोग हैं। जो खुद को स्थापित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाकर अनुभवी नेताओ की टांग खींचने का कोई मौका नहीं छोड़ते, वे कौनसे नेता हैं, जो राजनीति में अपने रसूख के बल पर निष्ठावान कांग्रेसियों को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। मंच पर नेताओं को गले लगवाने कि अपेक्षा इन तथ्यों पर विचार जरूरी है।

गले मिलने का अभिनय या आत्मचिंतन का आरंभ?

राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है, यह बात खुद पटवारी भी अच्छी तरह जानते हैं। उनका प्रयास इस दृष्टि से सराहनीय है कि उन्होंने कम से कम खुलकर यह स्वीकारा कि गुटबाजी एक वास्तविकता है, जिससे निपटना जरूरी है। मंच से तीन गुटों के नेताओं को एक साथ खड़ा करना, गले मिलवाना और फोटो खिंचवाना एक ‘राजनीतिक संदेशÓ था – मगर यही संदेश यदि संगठन के भीतर जमीनी बदलाव की प्रक्रिया में तब्दील न हुआ, तो यह केवल एक ‘इवेंटÓ बनकर रह जाएगा। क्योंकि इसके पूर्व भी कई मौकों पर इस तरह की तस्वीरें कई बार देखने को मिल चुकी हैं। लेकिन नतीजा आज भी वही ढांक के तीन पात जैसा ही नजर आ रहा है। गलबहियाँ कराने से कांग्रेस का सृजन हो जाएगा इसकी कोई ग्यारंटी अभी तक सामने तो नहीं आई है।

कार्यकर्ताओं की उम्मीदें और अविश्वास

जिले में कांग्रेस के पिछले इतिहास पर नजर डालें तो नेताओं की गुटबाजी के चलते निचले स्तर पर काम कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ता बार-बार इस गुटबाजी की राजनीति के शिकार होते रहे हैं। जब भी कोई कार्यकर्ता संगठन के लिए मेहनत करता है, उसकी पहचान गुट से जोड़ दी जाती है। नतीजतन, न तो उसे सम्मान मिलता है, न ही जिम्मेदारी। नेताओं के रसूख और इशारों पर खेलना कार्यकर्ता की मजबूरी बन कर रह जाता है। आपस मे गले मिलकर प्रमुख नेता अपने मतभेद तो दूर कर सकते हैं, लेकिन मनभेद को नहीं।

आम कार्यरत भी इसे पचा ले यह कहना भी काफी कठिन है।अब जब पटवारी ने संगठन सृजन की बात की ही है, तो असली परीक्षा इस बात की है कि क्या पार्टी ऐसे कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देगी जो निष्कलुष भाव से संगठन के लिए काम कर रहे हैं? या फिर वही जुने पुराने चेहरे और उनके गुट संगठन की कमान संभालते रहेंगे? यदि दूसरा ही सच है, तो फिर मनभेद की गांठ खुलने के बजाय और गहरी होती चली जाएगी।

जनता के सामने कमजोर चेहरा

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि गुटबाजी की सबसे बड़ी कीमत कांग्रेस ने जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोकर चुकाई है। जब पार्टी के नेता एक-दूसरे के खिलाफ काम करते हैं, तो जनता का भरोसा डगमगाता है। यही कारण है कि भाजपा भले ही जनता के मुद्दों पर घिरती रही हो, मगर कांग्रेस उन्हें भुनाने में असफल रही है। इसका एक बड़ा कारण पार्टी की अंदरूनी कमजोरी और गुटबाजी ही रही है।

मंच से संदेश, मगर क्या बंद कमरों में भी सहमति?

यह भी विचारणीय है कि मंच से मिले संदेशों के उलट बंद कमरों में नेताओं के बीच क्या चर्चाएं हुईं? क्या सचमुच पुराने आरोप-प्रत्यारोप खत्म हुए या बस दबा दिए गए? क्या नेताओं ने निजी महत्वाकांक्षाओं को त्यागकर संगठन को प्राथमिकता देने की हामी भरी? यदि ऐसा हुआ होता, तो पटवारी की पहल का मूल्य असाधारण होता। लेकिन यदि गले मिलना सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित था, तो यह संगठन के साथ एक बार फिर मजाक साबित होगा।

विचारधारा बनाम व्यक्ति-पूजा

जिले में कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी विडंबना ये है कि, यहां व्यक्ति-पूजा का बढ़ता चलन भी संगठन को कमजोर कर रहा है। जब संगठन गुटों में बंट जाए और विचारधारा की बजाय व्यक्ति विशेष के इशारों पर काम हो, तो जनता का विश्वास उठना तय है। पटवारी को यदि संगठन को वास्तव में पुनर्जीवित करना है, तो उन्हें केवल गुटों को एक मंच पर लाने से आगे बढ़कर, विचारधारा आधारित नेतृत्व खड़ा करना होगा।

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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