Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: निर्माण वाले विभाग में बिगड़े समीकरण तक साथी अधिकारी की फ़ाइल कैसे हुई गर्म?? कौनसे बड़े साहब है, जिनके आदेश आईना दिखा रहे??? थाना छूटा तो साहब ने लाइन में बैठे- बैठे कैसे गढ़ ली मलाईदार पोस्टिंग की पटकथा???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..

बिगड़े समीकरण तो साथी की फाइलें हुईं गरम
सरकारी महकमे में आपसी खींचतान और पटरी न बैठने के किस्से अक्सर पर्दे के पीछे ही चलते हैं, लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा ही दिलचस्प चर्चा में है। पिछले दिनों पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा में निर्माण कार्य से जुड़े और पूर्व में बैतूल में पदस्थ रहे एक अधिकारी के ठिकाने पर आर्थिक ईओडब्ल्यू की कार्रवाई में करोड़ों की संपत्ति सामने आने की चर्चा रही।
इधर, इसी कार्रवाई के बाद बैतूल में निर्माण कार्य से जुड़े एक प्रभारी अधिकारी की सक्रियता भी महकमे में चर्चा का विषय बन गई। बताया जा रहा है कि संबंधित अधिकारी से पहले से पटरी नहीं बैठने के कारण मौका मिलते ही उन्होंने छिंदवाड़ा में कार्रवाई की जद में आए अधिकारी से जुड़े पुराने मामलों और शिकायतों की जानकारी जुटाने में रुचि दिखाई।
महकमे में चर्चा है कि घोड़ाडोंगरी क्षेत्र के एक शिकायतकर्ता को भी इस कवायद में सक्रिय किया गया, ताकि संबंधित अधिकारी के खिलाफ पुराने मामलों या शिकायतों से जुड़ी कोई ठोस जानकारी सामने आ सके।
हालांकि, इस कथित कवायद में कितनी जानकारी हाथ लगी और उसका आगे क्या उपयोग हुआ, इसकी पुष्टि फिलहाल नहीं हो पाई है। बहरहाल, सरकारी दफ्तरों में फाइलें भले ही नियमों से चलती हों, लेकिन आपसी समीकरण बिगड़ जाएं तो पुरानी फाइलों की धूल भी अचानक साफ होने लगती है।
आइना दिखा रहे साहब के आदेश
जिले के प्रशासनिक महकमे में कुछ माह पहले पदस्थ हुए बड़े साहब इन दिनों सरकारी कामकाज से ज्यादा अपनी स्मार्टनेस, साइकिलिंग और फिटनेस को लेकर चर्चा में हैं। साहब का अंदाज भी निराला है कि दौरे पर निकलते हैं, मातहतों के साथ बैठक करते हैं और मौके पर ही निर्देशों की लंबी फेहरिस्त थमा देते हैं।
तस्वीर देखकर लगता है कि अब व्यवस्था की चाल भी साइकिल की रफ्तार से दौड़ने लगेगी, लेकिन असली कहानी दफ्तर से बाहर, जमीन पर जाकर समझ आती है। साहब के निर्देशों की हकीकत जानने के लिए बस ग्राउंड रिपोर्ट की जरूरत है। कई जगह आदेश फाइलों से आगे बढ़ ही नहीं पाए तो कहीं अमल के नाम पर औपचारिकता निभा दी गई।
यानी कागज पर व्यवस्था चाक-चौबंद और जमीन पर वही पुराने हाल। मजेदार बात यह है कि साहब के निर्देशों को ठेंगा दिखाने वाले भी कोई बाहर के लोग नहीं, बल्कि उन्हीं के मातहत बताए जा रहे हैं। साहब आदेश जारी कर फीलगुड कर रहे हैं और नीचे वाले शायद उसे ‘देख लेंगेÓ वाली फाइल में रखकर निश्चिंत बैठे हैं।
अब सवाल यह है कि साहब को अपने आदेशों का आइना कौन दिखाएगा? क्योंकि अगर मातहत ही आदेशों की हवा निकालते रहे तो दौरे, बैठकें और निर्देश सब कुछ कागजी फिटनेस एक्सरसाइज बनकर रह जाएंगे।
थाना छूटा तो साहब ने गढ़ ली ‘मलाईदार पोस्टिंगÓ की पटकथा
महकमे में एक थानेदार इन दिनों कार्रवाई से ज्यादा अपनी कथित रणनीति और उसके किस्से सुनाने को लेकर चर्चा में हैं। कप्तान ने थाने से विदाई क्या की, साहब की चर्चाओं का केंद्र ही बदल गया। अब रात के समय अपने करीबियों के बीच बैठकर वे अपनी ‘मास्टर प्लानिंगÓ के किस्से सुनाते बताए जा रहे हैं।
महकमे में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, रात 9 बजे के बाद साहब अपने खास लोगों के बीच यह दावा करते नजर आते हैं कि पुराने थाने से निकलने के लिए उन्होंने खुद ऐसा ‘पैटर्नÓ तैयार किया था, ताकि लाइन की राह खुल सके और इसके बाद किसी बड़े थाने में तैनाती का रास्ता बनाया जा सके। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।
साहब का कथित तर्क भी कम दिलचस्प नहीं है। बताया जा रहा है कि पुराने थाने में अधिकारियों की सेवा-सुश्रूषा से लेकर काम का बोझ तक ज्यादा था और मनमाफिक ‘फीलगुडÓ का माहौल नहीं बन पा रहा था। अब उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही कोई ‘मलाईदारÓ जिम्मेदारी मिल सकती है।
बहरहाल, पुलिस महकमे में पोस्टिंग का गणित कप्तान और आला अफसर तय करते हैं, लेकिन साहब के दावों की रफ्तार देखकर लगता है कि उन्होंने अगली कुर्सी तक पहुंचने की रणनीति अभी से तैयार कर ली है। अब देखना है कि दावा पहले सच होता है या नई डींग का अगला अध्याय खुलता है।
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