Ward Parikrama: पार्षद खुद सक्रिय नहीं, नपा पर पल्ला झाड़ने का प्रयास

वार्ड परिक्रमा में 33 में से 31 पार्षदों के कामकाज की खुली पोल
Ward Parikrama: बैतूल। आगामी निकाय चुनावों की आहट के बीच शहर की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है क्या वर्तमान पार्षद अपने वार्डों की जनता की उम्मीदों पर खरे उतर पाए हैं? शहर के 33 वार्डों में एक माह से अधिक समय तक किए गए जनसंपर्क, स्थानीय निरीक्षण और नागरिकों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर सामने आए निष्कर्षों ने नगरपालिका की राजनीति की तस्वीर को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है।
वार्ड स्तर पर लोगों की राय जानने और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता का आकलन करने के लिए किए गए इस व्यापक सर्वेक्षण में अधिकांश पार्षदों का प्रदर्शन निराशाजनक पाया गया। लोगों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर पार्षदों को तीन श्रेणियों उत्तीर्ण, 50/50 और अनुत्तीर्ण—में रखा गया था। सर्वे के अंत में जो परिणाम सामने आए, वे नगर राजनीति के लिए चिंताजनक संकेत माने जा रहे हैं।
33 में से केवल 2 पार्षद ही पहुंचे 50/50 की श्रेणी तक
शहर के 33 वार्डों में से केवल दो पार्षद ही ऐसे रहे जो लोगों की अपेक्षाओं के आधार पर 50/50 की श्रेणी तक पहुंच सके। इनमें भाजपा के टैगोर वार्ड के पार्षद नितेश (पिंटू) परिहार और विनोबा वार्ड की पार्षद शीला पिंटू महाले शामिल हैं। हालांकि ये दोनों भी पूरी तरह जनता का विश्वास जीतने में सफल नहीं रहे, लेकिन अन्य पार्षदों की तुलना में उनका प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर माना गया।
इसके विपरीत, शेष 31 पार्षद जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतर सके। इनमें भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के पार्षद शामिल हैं।
भाजपा के 24 में से 22 पार्षदों पर असंतोष
नगरपालिका परिषद में वर्तमान में भाजपा के 24 पार्षद हैं। वार्ड परिक्रमा के दौरान प्राप्त जनमत के अनुसार भाजपा के केवल दो पार्षद ही कुछ हद तक सकारात्मक छवि बनाए रखने में सफल रहे, जबकि बाकी 22 पार्षदों के कार्यों को लेकर लोगों ने नाराजगी व्यक्त की।
कई वार्डों में नागरिकों ने बताया कि चुनाव के बाद पार्षदों की सक्रियता कम हो गई। नियमित जनसंपर्क, समस्याओं का समाधान, वार्ड की निगरानी और विकास कार्यों को लेकर अपेक्षित पहल दिखाई नहीं दी। लोगों का कहना था कि कई मामलों में उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं नगरपालिका कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।
कांग्रेस के सभी 9 पार्षदों पर जनता ने जताई नाराजगी
नगरपालिका में कांग्रेस के 9 पार्षद हैं, लेकिन सर्वेक्षण के दौरान इनमें से कोई भी पार्षद ऐसा नहीं मिला जो जनता की नजरों में उल्लेखनीय अंक हासिल कर सका हो। कई वार्डों में लोगों ने कांग्रेस पार्षदों की निष्क्रियता, क्षेत्र में कम उपस्थिति और विकास कार्यों में प्रभावी भूमिका नहीं निभाने की शिकायतें कीं।
विपक्ष की भूमिका निभाने के बावजूद कांग्रेस पार्षद जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप दबाव बनाने या समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी संघर्ष करते हुए नजर नहीं आए। यही कारण रहा कि अधिकांश वार्डों में उनके प्रति असंतोष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
फंड नहीं मिलने का तर्क, लेकिन जनता ने नहीं किया स्वीकार
वार्ड भ्रमण के दौरान एक बात लगभग सभी दलों के पार्षदों की ओर से सामने आई। अधिकांश पार्षदों ने विकास कार्यों में बाधा के लिए नगरपालिका द्वारा पर्याप्त फंड उपलब्ध नहीं कराए जाने को जिम्मेदार बताया।
पार्षदों का कहना था कि राशि की कमी के कारण कई प्रस्तावित कार्य शुरू नहीं हो सके। हालांकि जनता का दृष्टिकोण इससे अलग नजर आया। नागरिकों का मानना है कि फंड की समस्या अपनी जगह है, लेकिन जनप्रतिनिधि का दायित्व केवल राशि की प्रतीक्षा करना नहीं, बल्कि अपने वार्ड के हितों के लिए संघर्ष करना और प्रशासन पर दबाव बनाना भी होता है।
कई नागरिकों ने कहा कि यदि किसी वार्ड में विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं तो पार्षदों को परिषद की बैठकों, प्रशासनिक मंचों और जनआंदोलनों के माध्यम से आवाज उठानी चाहिए थी। जनता के अनुसार सक्रियता और संघर्ष की कमी को केवल फंड की कमी के पीछे नहीं छिपाया जा सकता।
आज चुनाव हुए तो मुश्किल में पड़ सकते हैं अधिकांश पार्षद
वार्ड परिक्रमा के निष्कर्षों के अनुसार यदि वर्तमान परिस्थितियों में निकाय चुनाव आयोजित हो जाएं तो अधिकांश पार्षदों की जीत की गारंटी नहीं दिखाई देती। जनता के बीच व्यापक असंतोष और विकास कार्यों को लेकर उठ रहे सवाल चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव में पार्टी का प्रभाव अपनी जगह रहेगा, लेकिन स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार की सक्रियता, उपलब्धता और जनसंपर्क भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों को टिकट वितरण के समय जनता की भावना को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
चूंकि इस बार निकाय चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। विशेष रूप से नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होना है, यानी जनता सीधे अध्यक्ष का चुनाव करेगी। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के लिए मजबूत, सक्रिय और जनाधार वाले चेहरे तलाशना बड़ी चुनौती बन सकता है। वार्ड स्तर पर सामने आए जनमत से यह संकेत मिल रहा है कि वर्तमान पार्षदों को दोबारा टिकट देने का फैसला दोनों दलों के लिए आसान नहीं होगा।
यदि पार्टियां पुराने चेहरों पर ही भरोसा करती हैं तो उन्हें चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इतना जरूरी है कि पार्टी सिंबल पर चेहरे बदले तो जरूर सफलता मिल सकती है, लेकिन पुराने चेहरे पर दावं लगाने से भाजपा और कांग्रेस दोनों को नुकसान होने से इंकार नहीं किया जा सकता है।




