Betul Ki Khabar: दानवाखेड़ा में खुजली की बीमारी का प्रकोप, दो बच्चों की मौत

आज़ादी के 75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित आदिवासी गांव
Betul Ki Khabar: बैतूल। जिले का दानवाखेड़ा एक आदिवासी बाहुल्य गांव है, लेकिन आज भी यह गाँव शासन की बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह अछूता है। न यहाँ आंगनवाड़ी केंद्र है, न पक्की सड़क, न बिजली, न पीने का साफ पानी, न स्कूल और न ही कोई स्वास्थ्य सुविधा। यह हालात न सिर्फ प्रशासन की उपेक्षा को उजागर करते हैं, बल्कि विकास के दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।
दूषित पानी बना मौत की वजह
लगभग दो माह पूर्व गांव में दूषित पानी के कारण खुजली और त्वचा रोग का गंभीर प्रकोप फैला था। इस बीमारी की चपेट में आकर दो नन्हे-मुन्ने बच्चों की मौत हो चुकी है। यह घटना पूरे क्षेत्र को झकझोर देने वाली थी। ग्रामीणों ने दिसंबर माह की शुरुआत में ही इस गंभीर स्थिति से प्रशासन को अवगत कराया था।
अधिकारियों का दौरा और आश्वासन
घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारी गांव पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों को आश्वासन दिया गया कि दानवाखेड़ा में साफ पेयजल की व्यवस्था के लिए नया हैंडपंप खोदा जाएगा। इसके लिए अधिकारियों ने ग्रामीणों से कहा कि ट्रक और मशीनों के पहुंचने हेतु श्रमदान के माध्यम से कच्चा मार्ग तैयार किया जाए।
ग्रामीणों का श्रमदान, प्रशासन की उदासीनता
ग्रामीणों ने अपनी मजबूरी को समझते हुए श्रमदान किया और सड़क का निर्माण कार्य पूरा कर दिया। इस कार्य को पूरा हुए एक माह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक हैंडपंप खुदाई का काम शुरू नहीं हुआ है। आश्वासन केवल कागजों और बैठकों तक सीमित रह गया है। इस बीच बीमारी का प्रकोप अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
आज भी खतरे में ग्रामीणों का जीवन
साफ पानी के अभाव में ग्रामीण आज भी दूषित जल स्रोतों पर निर्भर हैं। इससे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर लगातार खतरा बना हुआ है। नजदीकी स्वास्थ्य सुविधा न होने के कारण मामूली बीमारी भी जानलेवा साबित हो सकती है।
दानवाखेड़ा के ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि उन्हें तत्काल साफ पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही गांव में सड़क, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र जैसी अन्य मूलभूत सुविधाएं भी शीघ्र मुहैया कराई जाएँ, ताकि वे भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें और शासन की योजनाओं का वास्तविक लाभ उन्हें मिल सके। दानवाखेड़ा की स्थिति यह सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक आदिवासी गांव विकास से यू ही दूर रखे।




