Prashasnik Kona : प्रशासनिक कोना: मार्च एंडिंग का यह कैसा रंग-रोगन उत्सव?? बड़े साहब के ही जूते हुए चोरी, फिर कैसे मचा हड़कंप??? वीआईपी मूवमेंट का जिले में कैसे रहा असर, अब क्या अधिकारी किस स्थिति में???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में……

मार्च एंडिंग का रंग-रोगन उत्सव!
मार्च आते ही सरकारी दफ्तरों में एक खास तरह की चहल-पहल शुरू हो जाती है, जिसे आम भाषा में बजट ठिकाने लगाने का सीजन कहा जाता है। पुलिस लाइन भी इससे अछूती नहीं है। यहां के साहब इन दिनों कुछ ज्यादा ही सक्रिय नजर आ रहे हैं। मानो समय कम हो और बजट ज्यादा। हालात ऐसे हैं कि जो वाहन पहले ही कंडम घोषित होकर कबाड़ की श्रेणी में पहुंच चुके हैं, वे भी अचानक सौंदर्यीकरण अभियान का हिस्सा बन गए हैं। उन पर रंग-रोगन ऐसा चढ़ाया जा रहा है, जैसे कल ही परेड में उतरने वाले हों। उधर जिन बिल्डिंगों को देखकर खुद प्लास्टर भी शर्माए, वहां भी मरम्मत का काम जोर-शोर से जारी है।
अब सवाल यह है कि यह सुधार कार्य है या मार्च एंडिंग महोत्सव क्योंकि जिन चीजों की उपयोगिता खत्म हो चुकी है, उन पर सरकारी धन बहाना समझ से परे है। लेकिन परंपरा तो परंपरा है, बजट बचना नहीं चाहिए, चाहे तर्क बचें या नहीं। जानकार बताते हैं कि अगर पूरे साल योजनाबद्ध तरीके से खर्च हो, तो मार्च में इस तरह की रचनात्मकता दिखाने की जरूरत ही न पड़े। फिलहाल तो हाल यह है कि कंडम संसाधनों में भी नई जान फूंकने की कोशिश जारी है।भले ही वह जान कागजों तक ही क्यों न सीमित रहे। आखिरकार, मार्च एंडिंग है जनाब… यहां हिसाब से ज्यादा खर्च बोलता है।
बड़े साहब के जूते चोरी होने से हड़कंप
वर्दी वाले विभाग की सख्ती और मुस्तैदी के किस्से अक्सर सुनने को मिलते हैं, लेकिन हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान घटी घटना ने इन दावों पर हल्का-सा व्यंग्य जरूर खड़ा कर दिया है। बताया जाता है कि विभाग के एक बड़े साहब के जूते कार्यक्रम स्थल से ही गायब हो गए। घटना के बाद स्वाभाविक रूप से हलचल मच गई। साहब के सारथी ने मौके पर मौजूद कुछ लोगों पर शक भी जताया, लेकिन जूते किस दिशा में प्रस्थान कर गए, यह अब तक रहस्य बना हुआ है।
कार्यक्रम चलता रहा, लेकिन चर्चा का केंद्र जूते ही बने रहे। अब सवाल यह उठता है कि जब सुरक्षा व्यवस्था के जिम्मेदार विभाग के बड़े साहब के जूते ही सुरक्षित नहीं रह पाए, तो आम लोगों की सुरक्षा का क्या भरोसा? यह घटना भले ही छोटी लगे, लेकिन अपने आप में एक बड़ा संकेत जरूर देती है। प्रशासनिक गलियारों में इसे लेकर चुटकी भी ली जा रही है कि अगर जूतों की सुरक्षा के लिए भी अलग से बंदोबस्त करना पड़े, तो फिर आम जनता को क्या सलाह दी जाए? अपने सामान के साथ-साथ नजरें भी चौकन्नी रखें। फिलहाल, जूतों की तलाश जारी है और उम्मीद की जा रही है कि वे जल्द ही बरामद हो जाएंगे, लेकिन इस जूता प्रकरण ने यह जरूर दिखा दिया कि सुरक्षा का सवाल कभी-कभी सबसे अप्रत्याशित जगहों पर खड़ा हो जाता है।
वीआईपी मूवमेंट से अलर्ट मोड पर अधिकारी
पिछले एक सप्ताह में जिले ने ऐसा नज़ारा देखा, जिसे प्रशासनिक भाषा में हाई प्रोफाइल व्यस्तता और आम बोलचाल में सांस रोक देने वाला वीआईपी मूवमेंट कहा जा सकता है। मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री और लगभग पूरी कैबिनेट के आगमन ने अधिकारियों की दिनचर्या को अचानक अलर्ट मोड में ला दिया। सड़कों से लेकर सभास्थलों तक, हर जगह व्यवस्थाएं ऐसी चाक-चौबंद नजर आईं मानो जिले ने अचानक अनुशासन का क्रैश कोर्स कर लिया हो। अधिकारियों और कर्मचारियों की मुस्तैदी देखते ही बन रही थी कि कहीं धूल तक को बिना अनुमति उड़ने की इजाजत नहीं थी।
काबिल-ए-तारीफ यह रहा कि इतने बड़े मूवमेंट के बावजूद कहीं कोई चूक सामने नहीं आई। सब कुछ इतना व्यवस्थित रहा कि मानो व्यवस्थाओं ने खुद ही वीआईपी का स्वागत करने की ठान ली हो। हालांकि, इस पूरे मुस्तैदी महापर्वं ने एक हल्का-सा सवाल भी छोड़ दिया है। क्या यही सतर्कता और व्यवस्था आम दिनों में भी देखने को मिल सकती है, या फिर इसके लिए हर बार किसी वीआईपी के आने का इंतजार करना पड़ेगा?फिलहाल तो प्रशासन ने इस चुनौती को सफलता से पार कर लिया है। लेकिन जाते-जाते वीआईपी मूवमेंट यह संदेश जरूर दे गया कि जब चाहें, तो सिस्टम पूरी तरह दुरुस्त हो सकता है कि बस ‘मौकाÓ खास होना चाहिए।




