Betul Hospital News: जिला अस्पताल में ठंड से बचने नहीं थे कोई साधन, मरीज हाथों से ड्रिप निकालकर पहुंचा अलाव के पास

ठंड के कारण अलाव के पास सोया, हाथ मे लगी सुई से हुई पहचान तो मचा हड़कंप
Betul Hospital News: बैतूल: जिला अस्पताल में एक चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कड़ाके की ठंड से परेशान होकर अस्पताल में भर्ती एक मरीज वार्ड से उठकर बाहर निकल आया और अस्पताल परिसर में जल रहे अलाव के पास जाकर सो गया। हैरानी की बात यह रही कि मरीज के हाथ में ड्रिप की सुई (नीडल) भी लगी हुई थी, इसके बावजूद किसी भी कर्मचारी या ड्यूटी डॉक्टर को इसकी भनक तक नहीं लगी।
बताया जा रहा है कि यह घटना रात के समय की है, जब ठंड का असर सबसे अधिक रहता है। मरीज ठंड से बचने के लिए वार्ड छोड़कर बाहर आ गया और अलाव के पास जमीन पर लेट गया। यह दृश्य देखकर अन्य लोगों ने मामले की जानकारी दी, तब जाकर अस्पताल स्टाफ हरकत में आया। गनीमत रही कि इस दौरान कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई, लेकिन यदि मरीज अलाव के बहुत करीब चला जाता या आग की चपेट में आ जाता तो गंभीर हादसा हो सकता था। इस घटना ने जिला अस्पताल में मरीजों की निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है।
सवाल यह उठता है कि जिस मरीज को भर्ती कर उपचार दिया जा रहा था, वह वार्ड से बाहर कैसे निकल गया। वार्ड में तैनात नर्सिंग स्टाफ, अटेंडेंट और ड्यूटी डॉक्टर, सुरक्षा गार्ड की जिम्मेदारी बनती है कि मरीजों पर लगातार नजर रखें, खासकर उन मरीजों पर जिन्हें ड्रिप या अन्य चिकित्सकीय उपकरण लगाए गए हों। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में ठंड से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। कई वार्डों में न तो पर्याप्त कंबल हैं और न ही हीटर या अन्य गर्माहट के साधन।
मजबूरी में मरीज और उनके परिजन ठंड से बचने के लिए बाहर अलाव का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति न केवल मरीजों की सेहत के लिए खतरनाक है, बल्कि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को भी उजागर करती है। इस पूरे मामले को लेकर लोगों में नाराजगी है और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की जा रही है।
यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसी घटनाएं किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। जिला अस्पताल जैसे प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र में इस तरह की लापरवाही बेहद चिंताजनक है और इसकी उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि दोबारा कोई मरीज अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर न हो।




