Betul News: जिले के आदिवासी छात्रावासों में अव्यवस्थाओं का साम्राज्य, अधीक्षक बने मठाधीश

व्यवस्था पूरी तरह भगवान भरोसे चल रही
Betul News: बैतूल। जिले के आदिवासी अंचलों में संचालित छात्रावासों की हालत बद से बदतर हो चुकी है। जिन छात्रावासों का उद्देश्य आदिवासी विद्यार्थियों को सुरक्षित और सुविधाजनक आवास उपलब्ध कराना है, वे आज अधीक्षकों की मनमानी, राजनीतिक पकड़ और बरसों पुरानी पदस्थापना के कारण अव्यवस्थाओं चरम प र है। सबसे ज्यादा दयनीय हालात भीमपुर, भैंसदेही और आमला ब्लॉक के छात्रावासों में देखे जा रहे हैं, जहां पूरी व्यवस्था लगभग ठप है और छात्रावास भगवान भरोसे चल रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन छात्रावासों में वर्षों से जमे अधीक्षक अपने पद को अधिकार नहीं बल्कि ‘निजी जागीरÓ की तरह चला रहे हैं। कई अधीक्षक ऐसे हैं जो रिटायरमेंट की कगार पर पहुंच चुके हैं, फिर भी वर्षों से एक ही छात्रावास में जमकर जमे हुए हैं। इतना ही नहीं, अधिकांश अधीक्षक रात में छात्रावास में रुकते तक नहीं, जिससे छात्रों की सुरक्षा और देखभाल का कोई जिम्मेदार ही नहीं बचता। शासन की योजनाओं के तहत मिलने वाली सुविधाएं भोजन सामग्री, स्वच्छता व्यवस्था, रख-रखाव और अन्य आवश्यक संसाधन—कागजों में तो उपलब्ध हैं, पर वास्तविकता में अधिकांश सुविधाएं छात्रों तक पहुंच ही नहीं पातीं। शिकायत मिलने पर भी जांच का ढोल बजाकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
झल्लार छात्रावासों की स्थिति तो जिले में चर्चा का विषय बनी रहती है। यहां पति-पत्नी दोनों ही लंबे समय से अधीक्षक के पद पर जमे हुए हैं। बताया जाता है कि इनमें से एक अधीक्षक मंत्री जी के रिश्तेदार हैं, जिससे इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि शिकायतों की फाइलें भी कार्रवाई से पहले दम तोड़ देती हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण ने इनको अखंड अधीक्षक बना दिया है।
भीमपुर और भैंसदेही क्षेत्र के छात्रावासों से कई बार सुविधाएं न मिलने की शिकायतें सार्वजनिक हो चुकी हैं। छात्रों के लिए न समय पर भोजन मिलता है, न स्वच्छता की व्यवस्था, न ही कोई निगरानी। कई छात्र बताते हैं कि अधीक्षक महीनों तक छात्रावास में दिखाई भी नहीं देते। ऐसी स्थिति में छात्रावासों का संचालन छात्रों की सुरक्षा और भविष्य दोनों से खिलवाड़ है। कुल मिलाकर, जिले के आदिवासी छात्रावासों में अव्यवस्थाओं का साम्राज्य इस कदर फैल चुका है कि तत्काल प्रशासनिक हस्तक्षेप के बिना सुधार की कोई संभावना नहीं दिखती। यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही तो इन छात्रावासों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।




