Betul News: जिले में 8 वर्षों में भी कम नहीं हुई जन्मदर, 23.7 प्रतिशत पर स्थिर

प्रत्येक वर्ष 30 से 31 हजार डिलीवरी, स्वास्थ्य विभाग की योजनाएं बेअसर
Betul News: बैतूल। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को लेकर चलाए जा रहे अभियान के बावजूद जिले की जन्मदर पिछले आठ वर्षों में लगभग स्थिर बनी हुई है। विभाग द्वारा दो बच्चे अच्छे और बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने जैसे संदेशों को व्यापक स्तर पर प्रचारित किया गया, लेकिन इन प्रयासों का प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। वर्ष 2018 से लेकर वर्तमान तक बैतूल जिले की जन्मदर लगभग 23.7 प्रतिशत के आसपास ही बनी हुई है।
जन्मदर में यह स्थिरता बताती है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयास पर्याप्त प्रभाव नहीं छोड़ पाए। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जिले में हर वर्ष 30 से 31 हजार प्रसव हो रहे हैं, जो दर्शाता है कि जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में किसी भी तरह की कमी नहीं आई है। जिले की कुल आबादी लगभग 17 लाख 86 हजार के आसपास है, और विभाग की मंशा दंपत्तियों की संख्या में कमी लाना है, लेकिन वर्तमान स्थिति इस लक्ष्य से काफी दूर है।
परिवार नियोजन साधनों का प्रचार भी बेअसर
जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य विभाग ने स्थायी साधनों के साथ-साथ अस्थायी गर्भनिरोधक विकल्पों-अंतरा इंजेक्शन, छाया गोली और अन्य साधन-के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए। लेकिन इन साधनों की उपयोगिता बढ़ाने के प्रयास सफल नहीं हुए। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इसकी स्वीकार्यता इच्छित स्तर तक नहीं पहुंच सकी। कई दंपत्तियों में परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता और समझ आज भी कम है, जिसके चलते जन्मदर में गिरावट नहीं आ पाई।
जिले में सबसे ज्यादा प्रसव जिला अस्पताल में
जन्मदर स्थिर रहने का असर जिले के स्वास्थ्य ढांचे पर भी देखा जा रहा है। बैतूल जिला अस्पताल पर प्रसव का सबसे अधिक दबाव रहता है। अन्य ब्लॉकों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से भी बड़ी संख्या में प्रसूताओं को जिला अस्पताल रेफर किया जाता है। यहां प्रतिदिन 30 से 40 प्रसव तक हो रहे हैं। बढ़ती संख्या के कारण अस्पताल पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सामान्य प्रसव के साथ-साथ कई प्रसव अब सीजरियन हो रहे हैं। सीजन की बढ़ती संख्या चिकित्सा ढांचे और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता पर भी सवाल खड़े करती है।

शिक्षा बढ़ी, लेकिन सोच नहीं बदली
यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि जिले के अधिकांश गांवों में शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है, स्कूल और शैक्षणिक संस्थान बढ़े हैं, और लोगों में जागरूकता बढ़ी है। इसके बावजूद जन्मदर में अपेक्षित कमी नहीं आ रही। इसका सबसे बड़ा कारण ग्रामीण इलाकों में फैली बेटे की चाहत है। कई परिवार आज भी मानते हैं कि घर में बेटा होना आवश्यक है। इस मानसिकता के चलते दो से अधिक बच्चे पैदा किए जा रहे हैं। बेटा होने तक बच्चे पैदा करने की सोच न केवल परिवार नियोजन की अवधारणा को कमजोर करती है, बल्कि माता और नवजात के स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम पैदा करती है।
स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी चुनौती
स्वास्थ्य विभाग चाहकर भी जन्मदर में कमी लाने में सफल नहीं हो पाया है। योजनाओं और प्रचार के बावजूद बदलाव धीमा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज की मानसिकता में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक परिवार नियोजन कार्यक्रमों के बेहतर परिणाम नहीं मिल पाएंगे। साथ ही विभाग को भी जमीनी स्तर पर और अधिक प्रभावी रणनीतियों और परामर्श सेवाओं की जरूरत है, ताकि दंपत्तियों को परिवार नियोजन के वास्तविक लाभ समझाए जा सकें। जन्मदर के स्थिर रहने से साफ है कि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ और बढ़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि विभाग और समाज दोनों मिलकर जनसंख्या नियंत्रण के प्रति अधिक गंभीरता दिखाएं, ताकि जन्मदर में सार्थक कमी लाई जा सके।




