Betul News: वन विभाग में तबादला नीति ताक पर
Betul News: Transfer policy in forest department is on hold

वर्षों से जमे वन कर्मचारी, जंगलों की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल
Betul News: बैतूल। शासन द्वारा तय नियमों के अनुसार किसी भी कर्मचारी की एक ही पदस्थापना पर अधिकतम तीन वर्षों तक सेवाएं निर्धारित की गई हैं, लेकिन वन वृत बैतूल में यह नीति पूरी तरह दम तोड़ती नजर आ रही है। यहां दर्जनों वन रक्षक, वनपाल और कार्यालयीन कर्मचारी ऐसे हैं जो 15 से 30 वर्षों से एक ही जगह या रेंज में पदस्थ हैं।
मैदानी अमले के स्थायी जमावड़े ने जहां विभागीय पारदर्शिता को प्रभावित किया है, वहीं जंगलों की सुरक्षा भी संकट में पड़ गई है। सूत्रों की मानें तो वर्षों से जमे कर्मचारियों की स्थानीय स्तर पर गहरी पकड़ और कथित सांठगांठ ने जंगलों में माफिया गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। सागौन की तस्करी और वन्यजीवों के शिकार जैसी घटनाएं आम हो गई हैं।
तबादलों के नाम पर दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली
हाल ही में शासन द्वारा तबादला प्रक्रिया की समयसीमा तीन बार बढ़ाई गई, लेकिन वन विभाग में अब तक तबादलों की कोई अधिकृत सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। दर्जनों कर्मचारी आज भी वर्षों से अपने पसंदीदा स्थानों पर जमे हुए हैं। सवाल उठता है कि क्या इन पर तबादला नीति लागू नहीं होती, या फिर विभागीय अधिकारियों की अनदेखी इसके पीछे कारण है? जानकारी के अनुसार, जिन कर्मचारियों के स्थानांतरण की जरूरत है, वे या तो एक ही परिक्षेत्र में इधर-उधर किए जा रहे हैं या उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। अधिकारियों की मूक स्वीकृति से यह संकेत मिल रहा है कि पूरी व्यवस्था ही सड़े हुए ढांचे की तरह चल रही है।
अंगद के पांव बने कर्मचारी, अफसरों की लाचारी उजागर
जब विभाग में वर्षों से पदस्थ कर्मचारियों की कुंडली खंगाली गई तो चौंकाने वाले नाम सामने आए। वनपाल हऊसू उइके 20 वर्षों से सारणी में पदस्थ हैं, जबकि प्रेमा वर्टी भी 2006 से वहीं डटी हुई हैं। सीसीएफ कार्यालय में बलवंत अडलक बीते 30 वर्षों से बाबूगिरी कर रहे हैं और हाल ही में उन्हें मुख्य लिपिक का प्रभार भी सौंप दिया गया है, जबकि कई वरिष्ठ कर्मचारी नजरअंदाज कर दिए गए। दक्षिण वनमंडल के लिपिक झरबड़े का तबादला आदेश पूर्व सीसीएफ मोहन मीणा और डीएफओ प्रफुल्ल फुलझेले द्वारा जारी किया गया था, लेकिन वह आज भी उसी स्थान पर विराजमान हैं। मुलताई के हरि परिहार और राजू पवार, शाहपुर के सतीश पिपले व पवन भलावी जैसे कई नाम हैं जो 15 से 20 वर्षों से एक ही क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं। शाहपुर के ही एक वनरक्षक पाल तो नियुक्ति के दिन से अब तक सिर्फ भौरा और शाहपुर में ही कार्यरत हैं और उन्होंने स्थानीय रसूखदार की भूमिका अपना ली है।
वन्यजीव संरक्षण की दिशा में उठाए जाने चाहिए सख्त कदम
भैसदेही परिक्षेत्र में वन रक्षक कृष्णा ठाकुर, शांतिलाल कासडे और डिप्टी रेंजर ओमप्रकाश हरोड़े भी 15 वर्षों से पदस्थ हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि इन सभी कर्मचारियों ने अधिकारियों से गहरे संबंध बनाकर अपना स्थान स्थायी कर लिया है। यह स्थिति वन विभाग की निष्पक्षता और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिह्न लगा रही है। यदि विभागीय प्रमुख निष्ठा के साथ कार्य करें, तैनाती की अधिकतम अवधि तय की जाए और पारदर्शिता से तबादले सुनिश्चित किए जाएं, तो वन्यजीवों की सुरक्षा और जंगलों के संरक्षण की दिशा में बड़ा सुधार संभव है।
इनका कहना ….
जिन कर्मचारियों के तबादले किए जाने हैं, उनकी सूची तैयार की जा चुकी है। प्रभारी मंत्री के अनुमोदन के उपरांत इसे सार्वजनिक किया जाएगा। वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों को भी चिन्हित कर कार्रवाई की जा रही है।
वासु कनोजिया, मुख्य वन संरक्षक, वन वृत बैतूल




