Prashasanik Kona: प्रशासनिक कोना: बहाली पर इनके चियर्स वाले जश्न की क्यों हो रही चर्चा?? अतिक्रमण हटाने को लेकर कौनसा दर्द आया जुबान पर??? दाढ़ी वाले किस साहब का बड़बोलापन सुर्खिया बटोर रहा???? पढ़िए विस्तार से हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..
Prashasanik Kona: Administrative Corner: Why is his cheering celebration on reinstatement being discussed??

चियर्स कर साहब मना रहे बहाली का जश्न
एक मामले में वर्दी वाले साहब को न्यायालय से राहत क्या मिली, वे जैसे जश्न में ही डूब गए। शाम ढलते-ढलते वे बडोरा की तरफ निकल पड़ते हैं। इसके बाद महफिलों का दौर शुरू होता है तो यह सिलसिला देर शाम तक जारी रहता है। न्यायालय से राहत मिलने के बाद साहब के साथ चियर्स की महफिल में टाइल्स बेचने वाले एक व्यवसायी सहभागी बन रहे। समय मिलते ही वाहनों को नियम विरूद्ध चलने पर कार्रवाई करने वाले एक साहब भी इस चियर्स पार्टी में शामिल हो जाते हैं। महफिल में देर शाम तक बैतूलबाजार रोड पर ढाबे या टाइल्स संचालक के कार्यालय में जमकर इंज्वाय हो रहा है। कुल मिलाकर लाइन में पदस्थ यह साहब बाहल होने का जश्न इस तरह से मना रहे हैं कि चर्चा विभाग से लेकर कई लोगों तक पहुंच गई है। वैसे साहब और चालानी करने वाले साहब का याराना तो सही पर टाइल्स वाले से इनकी दोस्ती को लेकर कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं।
अतिक्रमण को लेकर इनका अलग ही दर्द
शहर में अतिक्रमण की कार्रवाई पर उठ रहे सवालों के बीच एक जिम्मेदार आरआई का दर्द जुबां पर आ गया है। वे कहते हैं कि बड़े साहब जैसे निर्देश देते हैं, वैसे कार्रवाई करते हंैं। उनकी यह बात भी खासी चर्चा में है कि साधन नहीं होने से अतिक्रमण की कार्रवाई नहीं हो पा रही है। अतिक्रमण हटाने के लिए लेबर भी लगते हैं, लेकिन इसकी व्यवस्था भी नहीं होने से सीधा हमको टारगेट किया जाता है। यदि साहब हमको लिखकर दे दे तो सबकुछ कर सकते हैं। आरआई का दर्द ऐसे समय जुबां पर आया है, जब अतिक्रमण हटाने के लिए भेदभाव के आरोप लग रहे हैं। उन्होंने अपने तरकश का तीर बड़े साहब पर डालकर जिस तरह पाक-साफ होने का सबूत दिया है, यह खूब सुर्खियां बटोर रहा है।
दाढ़ी वाले अधिकारी का बड़बोलापन सुर्खियों में
जिला मुख्यालय पर पदस्थ दाढ़ी वाले साहब अपनी पदस्थापना के बाद किसी ना किसी बहाने सुर्खियों में रहते हैं। दरअसल, वे अपने बड़बोलेपन और अधिकारियों के बीच रसूख दिखाने का कोई प्रयास नहीं छोड़ते। बस उनकी यही र्स्माटनेस विवाद का कारण बनते जा रही है। दाढ़ी रखना या क्लिन शेव होकर दफ्तर जाने पर शासन ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया, लेकिन साहब थोड़ा कड़क मिजाज दिखाने के लिए दाढ़ी का शौक पाल रखे है।
कभी अपने चैंबर में मिलने पहुंचे अधीनस्थों और राष्ट्रनिर्माताओं को खूब सीख देते रहते हैं। हालांकि कड़क मिजाज बनने के कारण वे अधीनस्थों की मांग पूरी नहीं कर पा रहे। विभाग में अंदर ही अंदर उनका जमकर विरोध चल रहा है। खबर तो है कि साहब की रवानगी के लिए भी राष्ट्र निर्माताओं का एक धड़ा जनप्रतिनिधियों से भी मिल चुका है। पता तो यह भी चला है कि दाढ़ी वाले यह साहब गुटखे-पाऊच के बेजा शौकीन होने के साथ पाठ पढ़ाने वाले विभाग से जुड़े है। इन्हीं साहब ने शहर में एक बड़े आयोजन के लिए निजी संचालकों से राशि वसूलने का बेतूका फरमान दिया था।




