Pind Daan-Tarpan : जिनका कोई अपना नहीं था, उनका भी निभाया आखिरी फर्ज

13 लावारिस आत्माओं का नपा ने किया पिंडदान-तर्पण
Pind Daan-Tarpan : बैतूल। दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी मृत्यु के बाद न कोई आंसू बहाने वाला होता है और न ही कोई उनका नाम लेकर अंतिम विदाई देने वाला। न कोई अपना, न परिवार और न ही पहचान। ऐसे ही निराश्रित और लावारिस दिवंगतों के प्रति संवेदना दिखाते हुए बैतूल नगर पालिका ने पितृ मोक्ष अमावस्या पर मानवता और इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश की, जो समाज को संवेदनशीलता का बेहतरीन संदेश देती है।
माचना नदी घाट पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल की पहल पर 13 दिवंगत आत्माओं की शांति और मोक्ष के लिए विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण किया गया विनोबा वार्ड स्थित माचना नदी के तट पर आयोजित इस भावुक धार्मिक अनुष्ठान में नगर पालिका सीएमओ नवनीत पांडेय ने स्वयं आगे बढ़कर पूरी जिम्मेदारी निभाई।
उन्होंने अपने हाथों से पिंडदान और तर्पण कर उन दिवंगत आत्माओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त की, जिनका इस दुनिया में कोई अपना नहीं था। आमतौर पर पितरों का श्राद्ध उनके परिजन करते हैं, लेकिन इन 13 आत्माओं के लिए नगर पालिका ने ही परिजन जैसी भूमिका निभाई। इस पहल ने यह संदेश दिया कि इंसानियत का रिश्ता केवल खून के संबंधों तक सीमित नहीं होता।
पुराने रिकॉर्ड खंगाले, 13 दिवंगतों के तर्पण की हुई व्यवस्था
सीएमओ नवनीत पांडेय ने बताया कि इस आयोजन के लिए नगर पालिका का पुराना रिकॉर्ड निकलवाया गया। यह जानकारी जुटाई गई कि नगर पालिका के माध्यम से कितने निराश्रित और लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराया गया था। रिकॉर्ड के आधार पर आवश्यक व्यवस्थाएं की गईं। विधि-विधान से पूजन-पाठ कराने के लिए पंडित की व्यवस्था की गई और कुल 13 दिवंगत आत्माओं के निमित्त पिंडदान एवं तर्पण संपन्न कराया गया।
माचना तट पर जुटे समाजसेवी, इंसानियत का दिया संदेश
कार्यक्रम में शहर के समाजसेवी, गणमान्य नागरिक और नगर पालिका के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल हुए। सीएमओ ने बताया कि गरुड़ पुराण में निराश्रित और लावारिस दिवंगतों के पिंडदान का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसे कर्मकांड से पुण्य की प्राप्ति और दिवंगत आत्माओं की शांति की कामना की जाती है।
नगर पालिका की यह पहल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति सम्मान का भाव थी, जो जीवनभर अकेले रहे और मृत्यु के बाद भी जिनका कोई अपना सामने नहीं आया। माचना नदी के तट पर किया गया यह तर्पण याद दिलाता है कि मृत्यु के बाद भी हर इंसान सम्मान का हकदार है और मानवता का धर्म किसी को अकेला न छोड़ना है।
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