Betul Samachar: वन विभाग में 2 करोड़ के घोटाले की पिक्चर के कितने किरदार?

ऑपरेटरों की भूमिका पर अधिकारियों की मुहर, लंबित जांच संदेह के घेरे में, दो दिन पहले फर्जी बाउचर जलाने की भी खबर
Betul Samachar: बैतूल। वन वृत के एक वनमंडल में करीब 2 करोड़ 13 लाख 95 हजार के कथित घोटाले ने पूरे वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि एक उच्च अधिकारी द्वारा कतिथ ऑपरेटरों को हटाने के निर्देश दिए जाने के बाद भी विभागीय अधिकारियों ने इन्हें हटाने में रुचि नहीं दिखाई, क्योंकि यही ऑपरेटर अधिकारियों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गियां बनी हुई थी। अब खुलासा हो रहा है कि कथित ऑपरेटरों ने अधिकारियों की शह पर फर्जी खातों में करोड़ों की राशि डालकर पूरी तिजोरी ही गर्म कर ली थी। मामला तब उजागर हुआ, जब आयुक्त, कोष एवं लेखा ने सरकारी धन के दुरुपयोग को पकड़ते हुए सीधे कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी को जांच के निर्देश जारी किए। आदेश जारी हुए करीब चार माह बीत चुके हैं, लेकिन जांच अभी भी अधूरी पड़ी है, जो खुद जांच प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
रातोरात फर्जी खातों में डाली गई रकम
सूत्र बताते है कि करोड़ों के इस घोटाले को अंजाम देने के लिए काफी जल्दबाजी की गई। जिन कार्यों का अस्तित्व जमीन पर नहीं था, उन जंगल कार्यों के बाउचर रातोंरात तैयार कर लिए गए। अधिकारियों से फ्री हैंड मिलते ही कथित ऑपरेटरों ने भी तेज़ी से काम शुरू कर दिया और कुछ ही दिनों में करोड़ों की सरकारी राशि फर्जी खातों में ट्रांस$फर कर दी। सूत्र यह भी बताते हैं कि वन मंडल में पदस्थ एक ऑपरेटर, जो विभाग के एक अधिकारी और एक रेंजर का खास बताया जा रहा है, उसने पूरे टास्क को न केवल पूरी जिम्मेदारी से निभाया बल्कि अधिकारियों की इच्छाओं को भी पूरी निष्ठा से पूरा किया।
दो दिन पहले जलाए गए फर्जी बाउचर!
कलेक्टर को कोष एवं लेखा आयुक्त से पत्र प्राप्त होते ही वन विभाग में हड़कंप मच गया। इसी अफरा-तफरी में विभाग के ही एक रेंजर द्वारा लॉबिंग शुरू करने की खबर है। सूत्रों का दावा है कि घोटाले से जुड़े सैकड़ों फर्जी बाउचर दो दिन पहले ही जला दिए गए, ताकि जांच में कोई प्रमाण न मिल सके। गौरतलब है कि जांच के निर्देश 25 अगस्त 2025 को जारी किए गए थे, फिर भी चार महीने बीत जाने के बाद भी जांच अधूरी पड़ी हुई है। आखिर किस वजह से जांच रोकी गई? क्या जांच आगे बढ़ी तो कई ‘बड़ी मछलियांÓ जाल में फंस सकती हैं? इन सवालों ने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर संदेह खड़ा कर दिया है।




