Politics: राजनीतिक हलचल: 2 नेताओं को मंच पर नहीं मिली कुर्सी तो फिर क्या हुआ बवाल?? छात्रसंघ चुनाव से पहले ही रिजल्ट का आखिर क्या माजरा है??? नेताजी की इनकी कुर्सी गई तो आखिर मुड क्यों बदल गया???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

कुर्सी के विवाद की खूब चर्चा, प्रोटोकॉल ने बढ़ाई गर्मी!
सत्ता पक्ष के जिला मुख्यालय में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर हुए आयोजन के बाद अब भाषणों से ज्यादा कुर्सियों की चर्चा हो रही है। कार्यक्रम में क्षेत्रीय सांसद और केंद्रीय मंत्री समेत सत्तारूढ़ दल के तमाम बड़े चेहरे मौजूद थे।
इसी बीच मंच की एक कुर्सी ने ऐसा सियासी रंग लिया कि आयोजन का तापमान कुछ देर के लिए बढ़ गया। चर्चा है कि कभी पंचायत में नंबर-2 की हैसियत रखने वाले एक पूर्व प्रतिनिधि और पिछड़ा वर्ग के एक प्रदेश प्रतिनिधि को मंच पर कुर्सी नहीं मिली तो दोनों ने आयोजन की व्यवस्था संभाल रहे जिम्मेदारों पर नाराजगी जताई।
हालांकि अंदरखाने की बात यह भी है कि तय प्रोटोकॉल की सूची में दोनों के नाम मंच पर बैठने वाले अतिथियों में शामिल नहीं थे। यानी मामला कुर्सी का कम और सम्मान का ज्यादा नजर आया। बाद में दोनों नेताओं के लिए कुर्सियां लगाकर मामला संभाल लिया गया। मगर तब तक कुर्सी की कहानी कार्यक्रम से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी थी। अब चर्चा यही कुर्सी छोटी थी या नाराजगी बड़ी?
छात्रसंघ चुनाव से पहले ही रिजल्ट की चर्चा!
विपक्षी पार्टी ने छात्रसंघ चुनाव की कमान जिन चेहरों को सौंपी है, अब उन्हीं की कॉलेज राजनीति में पुरानी सक्रियता को लेकर पार्टी के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। खासकर पार्टी की छात्रविंग के कुछ नेता तो इस फैसले पर चुटकी लेने से भी पीछे नहीं हट रहे।
गलियारों में मजाकिया अंदाज में कहा जा रहा है चुनाव होने से पहले ही रिजल्ट घोषित हो गया! दरअसल, चर्चा इस बात की है कि जिन्हें चुनावी जिम्मेदारी दी गई है, उनका कॉलेज के छात्र राजनीति से सीधा जुड़ाव और सक्रियता कितनी रही है। इसी को लेकर छात्रविंग के कुछ नेताओं में कानाफूसी तेज है।
पुराने कार्यकर्ता इसे लेकर अपनी-अपनी व्याख्या कर रहे हैं और सोशल मीडिया से लेकर कैंपस की चर्चाओं तक सवाल तैर रहे हैं। दिलचस्प मोड़ तब आता है जब चर्चा पुराने एक चुनाव की ओर भी घूम जाती है। कहा जा रहा है कि संबंधित चेहरों के चुनाव लड़ने के दौरान जो सियासी समीकरण बने थे, कहीं वैसा ही दृश्य इस बार छात्रसंघ चुनाव में न दोहर जाए। फिलहाल चुनाव बाकी है, लेकिन चर्चाओं ने पहले ही कैंपस में माहौल गर्म कर दिया है।
कुर्सी गई तो, मूड भी बदला!
सत्ता पक्ष के जिला मुख्यालय से इन दिनों एक दिलचस्प चर्चा छनकर बाहर आ रही है। संगठन में जिम्मेदारियों के फेरबदल ने एक पूर्व पार्षद को खासा मायूस कर दिया है। साहब पहले मूल संगठन में जिला मंत्री हुआ करते थे, लेकिन अब उन्हें एक मोर्चे में कार्यालय मंत्री जैसी जिम्मेदारी मिली है। पद भले संगठन का ही है, लेकिन साहब इसे साफ तौर पर अपना डिमोशन मान रहे हैं।
चर्चा है कि नई जिम्मेदारी मिलने के बाद से उनका मन संगठन के काम में पहले जैसा नहीं लग रहा। आखिर बात सिर्फ पदनाम की नहीं, प्रतिष्ठा की भी है! कल तक जिला संगठन में जिम्मेदारी संभालने वाले नेता को अब मोर्चे की जिम्मेदारी मिली तो मन में सवाल उठना लाजिमी है, ऊंचाई बढ़ी या सीढ़ी ही बदल गई?
चर्चा यह भी है कि साहब ने अपनी नाराजगी मन में दबाकर रखने के बजाय वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचा दी है। अब देखना यह है कि संगठन उनकी नाराजगी को समझता है या फिर उन्हें समझाने के लिए एक और जिम्मेदारी थमा देता है। फिलहाल जिला मुख्यालय में चर्चा यही है कि पद छोटा हुआ है या साहब की उम्मीद बड़ी थी?
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