Politics: राजनीतिक हलचल: कौनसे नेताजी ने अधिकारी से पूछा नाम,न फिर जाति पर अटकी जुबान?? खबरों की प्लांटिंग में किस पार्षद का कोई नहीं सानी??? दिग्गजों के पैचअप के बीच कार्यकर्ता -समर्थक कैसे बने पेंडलुम???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

नेताजी ने पूछा नाम, फिर जाति पर अटकी जुबान!
साहब, सवाल सिर्फ सवाल नहीं होते… कभी-कभी अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ जाते हैं। हाल ही में एक विपक्षी पार्टी के प्रदर्शन के दौरान दल के जिला प्रमुख की कथित बदजुबानी अब प्रदर्शन से ज्यादा विभागीय गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
चर्चा है कि प्रदर्शन के दौरान एक महिला नेत्री और सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाली विभाग की युवा महिला अधिकारी के बीच किसी बात को लेकर बहस चल रही थी, तभी विपक्षी पार्टी के जिला प्रमुख वहां पहुंचे। पहले अधिकारी का नाम पूछा गया और फिर उनकी जाति पूछ ली गई।
बस, इतना पूछना था कि पहली फील्ड पोस्टिंग संभाल रही युवा अधिकारी का चेहरा उतर गया और वे पीछे हट गईं। मौके पर विभाग के ‘नंबर-2Ó भी मौजूद बताए जा रहे थे,लेकिन साहब की चुप्पी ऐसी रही कि मानो वहां कुछ हुआ ही न हो। अब सवाल यह है कि चुप्पी मजबूरी थी या रणनीति?
घटना की चर्चा विभाग में आग की तरह फैली और विपक्षी दल के जिला प्रमुख के व्यवहार को लेकर नाराजगी भी सामने आने लगी। हालांकि मामला सार्वजनिक मंच से ज्यादा बंद कमरों में चर्चा का विषय है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सवाल तैर रहा है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन सवाल पूछने का तरीका भी तो बड़ा होना चाहिए!
खबरों की ‘प्लांटिंग’ में पार्षद जी का कोई सानी नहीं!
नगर की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जो सदन में कम और सुर्खियों में ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। सत्ताधारी पार्टी के एक सीनियर पार्षद को लेकर इन दिनों ऐसी ही चर्चा राजनीतिक गलियारों में खूब गर्म है। कहा जा रहा है कि पार्षद जी खबरों की ‘प्लांटिंगÓ की कला में माहिर हैं।
खास बात यह कि खबर ऐसी शैली में सामने आती है कि पहली नजर में उसका कनेक्शन पार्षद जी से जोड़ना आसान नहीं होता। चर्चा तो यह भी है कि जब मामला अपने व्यावसायिक हित से जुड़ा हो, तब खबर की भाषा और टाइमिंग दोनों का खास ख्याल रखा जाता है।
हाल ही में सौंदर्यीकरण से जुड़ी खबर को लेकर भी इसी तरह की कानाफूसी सुनाई दे रही है। माना जा रहा है कि इसके जरिए पार्षद जी ने अपने प्रभाव और दखल का सार्वजनिक संदेश देने की कोशिश की। अब शहर में सवाल यही है कि खबर चल रही है या खबर चलवाई जा रही है।
दिग्गजों के पैचअप, के बीच पेंडुलम बने कार्यकर्ता- समर्थक
राजनीति भी गजब की चीज है। यहां विवाद नेताओं का होता है, बयान नेता देते हैं, हाथ नेता मिलाते हैं, गले नेता लगते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा फजीहत और सिरदर्द कार्यकर्ताओं का होता है।
कुछ महीने पहले सृजन कार्यक्रम में दिग्गजों के बीच ऐसा सृजन हुआ कि समर्थकों में विभाजन की नई फसल उग आई। कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने नेता के समर्थन में मोर्चा संभाला, शिकवा ,शिकायतें, थाना, पुलिस तक विवाद पहुंच गया, और सोशल मीडिया पर भी तलवारें भांजीं। फिर अचानक बड़े नेताओं का हस्तक्षेप हुआ और बड़े नेताओं के हस्तक्षेप से दोनों दिग्गजों में पैचअप हो गया।
अब मंचों पर मुस्कुराहटें हैं, गलबहियां हैं और सब कुछ सामान्य है। असामान्य हैं तो सिर्फ वे कार्यकर्ता, जो अब एक-दूसरे को देखकर सोच रहे हैं कि कल तक वह जिसे राजनीतिक खलनायक बता रहे थे, आज उसे क्या कहें? मजे की बात यह है कि समझौते की सूचना देने के लिए कार्यकर्ताओं को कोई संदेश तक जरूरी नहीं समझा गया कि, विवाद खत्म हो चुका है, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ें।
शायद ठगे जाने वाले यह कार्यकर्ता सिर्फ भीड़, नारे और धरना-प्रदर्शन के लिए ही बने हैं! अब सवाल यह है कि दिग्गजों का पैचअप तो हो गया, लेकिन समर्थकों के मन का पैच कौन लगाएगा?ये समझना जरूरी है, वरना सृजन अभियान में कार्यकर्ता यूं ही पेंडुलम बनकर झूलता रहेगा।
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