Rajnaitik Halchal राजनीतिक हलचल: पैर पड़े तो क्यों आगबबूला हुए पार्टी प्रमुख?? हर ठीकरा प्रदेश अध्यक्ष के सिर, बाकी सब बेफिक्र कैसे???? ताज मिलते ही नेताजी के कैसे बदले सुर, तेवर सातवे आसमान पर???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

पैर पड़े तो क्यों भड़के जिला प्रमुख?

राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक किस्सा खूब चटखारे लेकर सुनाया जा रहा है। किस्सा विपक्षी खेमे का है और इसमें पद, प्रतिष्ठा, स्वाभिमान और मनुहार सबका तड़का लगा हुआ है। चर्चा हैं कि यह मामला भले थोड़ा पुराना है, लेकिन इसे राजनीति बदलते दौर में चटकारे लगाकर सुनाया जा रहा है। बताया जाता है कि विपक्षी दल के एक युवा प्रमुख ने किसी कार्यक्रम में पूर्व मंत्री के पैर छू लिए। बस फिर क्या था, पार्टी के जिला प्रमुख साहब इतने नाराज कि कथित तौर पर बात यहां तक पहुंच गई कि युवा प्रमुख के परिवार को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां कर दी गईं। नतीजा यह हुआ कि युवा प्रमुख रुष्ट होकर अलग-थलग पड़ गए। अब राजनीति में रूठना भी एक कला है और मनाना उससे बड़ी कला।

लिहाजा रूठे युवा प्रमुख को फिर से खेमे में लाने की जिम्मेदारी संभाली किसी युवा नेता चब्बा ने। चर्चाओं की मानें तो मान-मनौव्वल का दौर चला और नाराजगी दूर करने की कोशिशें शुरू हो गईं। यह पूरा घटनाक्रम अब पार्टी के भीतर और बाहर चर्चा का विषय बना हुआ है। बमजेदार बात यह है कि इस किस्से की चर्चा एक अल्पसंख्यक प्रदेश पदाधिकारी ने पार्टी छोड़ चुके पूर्व अध्यक्ष के ठिकाने पर बड़े चटखारे लेकर की।

उनका कहना था कि भाई, कुछ लोगों में स्वाभिमान नाम की चीज भी होती है या नहीं? इसी दौरान उन्होंने एक और पुराना किस्सा सुना दिया। उनके मुताबिक, कुछ माह पहले पंचायत सदस्य का चुनाव हार चुके एक बहुसंख्यक नेता को कथित तौर पर पैसे के लेन-देन के विवाद में थप्पड़ तक पड़ गए थे,लेकिन इसे नेता ने जरा सा समझाया-बुझाया तो साहब भी ज्यादा देर रूठे नहीं और फिर मान गए।

अब राजनीतिक गलियारों में सवाल यही घूम रहा है। सियासत में विचारधारा बड़ी है। पद बड़ा है या फिर ‘मनाने वाले’ का प्रभाव? किस्सा चाहे जो हो, फिलहाल पार्टी के अंदर की यह ‘रूठने-मनाने’ वाली राजनीति चाय की प्यालियों से लेकर बंद कमरों तक खूब चर्चा बटोर रही है।

हर ठीकरा प्रदेश अध्यक्ष के सिर, बाकी सब बेफिक्र!

इन दिनों सियासी गलियारों में एक नया चलन खूब चर्चा में है। पंचायत से लेकर वार्ड तक कहीं भी कोई मामला बिगड़े, व्यवस्था सवालों के घेरे में आए या किसी की जवाबदेही तय होने लगे फटाफट ठीकरा प्रदेश अध्यक्ष के सिर फोड़ दो। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक एक ही फार्मूला मानो खूब चल रहा है।

मामला स्थानीय, जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष की! मजे की बात यह कि इस खेल में बाकी जिम्मेदार किरदार बड़ी आसानी से पर्दे के पीछे चले जाते हैं। जिस मामले में स्थानीय स्तर पर जवाब मांगा जाना चाहिए, वहां चर्चा प्रदेश अध्यक्ष की होने लगती है। मानो प्रदेश अध्यक्ष ने ही वार्ड की नाली से लेकर पंचायत की फाइल तक संभाल रखी हो। सियासी चटखारे लेने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि ठीकरा फोड़ने का बाकायदा रेट कार्ड भी चल रहा है। विरोधी खेमे के कुछ खिलाड़ी अगर चर्चाओं पर भरोसा करें तो इसके लिए ‘पेमेंट सिस्टम’ तक की बातें बाजार में तैर रही हैं।

हालांकि इन दावों की पुष्टि कौन करेगा, यह सवाल अपनी जगह है, लेकिन अफवाहों का बाजार जरूर गर्म है। असल सवाल यह है कि अगर हर छोटी-बड़ी गड़बड़ी का जवाब प्रदेश अध्यक्ष ही देंगे, तो फिर स्थानीय पदों पर बैठे जिम्मेदारों की भूमिका क्या रह जाती है। राजनीति में विरोध जरूरी है, सवाल भी जरूरी हैं, लेकिन हर सवाल का जवाब एक ही व्यक्ति से मांगने की आदत कहीं बाकी जवाबदेही को ही न निगल जाए।

ताज मिलते ही बदले नेताजी जी!

सत्तारूढ़ दल के एक युवा संगठन में पिछले दिनों हुई नियुक्ति के बाद एक नेताजी इन दिनों खासे चर्चा में हैं। नेताजी अनुभवी हैं, संगठन में लंबा समय भी दिया है और आखिरकार इंतजार के बाद पद का ताज भी सिर पर सज गया। लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि ताज आया तो अंदाज भी बदल गया!

कहते हैं पद मिलने के बाद नेताजी का रुतबा अचानक इतना बढ़ गया कि अब मोबाइल की घंटी भी उन्हें आम कार्यकर्ताओं की चीज लगने लगी है। कई लोग फोन लगाते-लगाते थक जा रहे हैं, लेकिन नेताजी हैं कि फोन उठाना शायद अपने नए पद की शान के खिलाफ समझ रहे हैं।

कार्यकर्ताओं में कानाफूसी शुरू है कि कल तक जिनसे सहजता से बात हो जाती थी, अब उनसे संपर्क करना भी किसी वीआईपी अपॉइंटमेंट से कम नहीं। कोई फोन करे तो इंतजार, दोबारा करे तो फिर इंतजार और लगातार करे तो शायद यही संदेश, पद मिल गया है भाई, अब पहुंच भी बढ़ गई है! संगठन में पद मिलने के बाद उत्साह स्वाभाविक है, लेकिन सियासत में पद के साथ बढ़ती दूरी हमेशा चर्चा का विषय बन जाती है।

खासकर युवा संगठन में तो कार्यकर्ताओं से संवाद ही सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। फिलहाल नेताजी की नई ‘वीआईपी व्यवस्था’ से कुछ कार्यकर्ता खफा बताए जा रहे हैं। संगठन के लोग दबी जुबान में यह भी कह रहे हैं कि ताज सिर पर सजने में देर नहीं लगती, लेकिन ताज को संभालने के लिए जमीन से जुड़े रहना पड़ता है।

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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