प्रशासनिक कोना: कौनसे साहब का काम कम, इमेज बिल्डिंग का दिख रहा जलवा?? बतोलेबाज अधिकारी यह कैसी बतोलेबाजी??? किस टीआई ने शुरू की नए थाने के लिए लॉबिंग???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में….……

साहब का काम कम, इमेज बिल्डिंग का खेल ज्यादा

जिले के एक बड़े साहब इन दिनों ‘काम कम और काम करते हुए दिखने’ की कला में माहिर बताए जा रहे हैं। सरकारी गलियारों में चर्चा है कि साहब की पूरी कवायद इन दिनों इमेज बिल्डिंग के इर्द-गिर्द घूम रही है। बैठकें हों, निर्देश हों या निरीक्षण हर जगह सक्रियता नजर आती है, लेकिन नीचे तक पहुंचते-पहुंचते इन निर्देशों का असर कितना बचता है, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। चर्चा है कि वरिष्ठ कार्यालय से आने वाले आदेश-निर्देशों को लेकर भी विभागीय हलकों में चर्चाएं हैं। कहा जा रहा है कि ऊपर से आदेश तो समय पर पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन की रफ्तार देखकर लगता है जैसे फाइल ने रास्ते में ही ब्रेक लगा लिया हो। साहब के कार्यालय से निर्देशों की कमी नहीं, मगर जमीनी स्तर पर उनका असर तलाशने निकलें तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। चर्चा यह भी है कि साहब अधिकारियों-कर्मचारियों को निर्देश देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

मगर असली सवाल यह है कि इन निर्देशों का पालन कौन, कब और कितना कर रहा है? अगर साहब कभी अपने ही निर्देशों की मौके पर जाकर समीक्षा कर लें तो शायद सरकारी तंत्र की वास्तविक स्थिति किसी आईने की तरह साफ दिखाई दे जाए। फिलहाल सरकारी गलियारों में यही चर्चा है कि साहब की सक्रियता कैमरे और कागज पर तो खूब दिख रही है, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी की रफ्तार में उसका असर कितना है, यह जमीन पर जाकर ही पता चलेगा। अब देखना यह है कि साहब इमेज बिल्डिंग से आगे बढ़कर अपने निर्देशों की मॉनिटरिंग भी शुरू करते हैं या नहीं।

बतोलेबाज अधिकारी की बातोलेबाजी

जिले के ‘कमाईपुत’ विभाग में पिछले करीब नौ वर्षों से अंगद के पैर की तरह जमे साहब की बातोलेबाजी के किस्से इन दिनों विभागीय गलियारों में खूब चटकारे लेकर सुनाए जा रहे हैं। साहब के मुंह से निकली बातों में आत्मविश्वास इतना कि सुनने वाला भी एक पल को सोच में पड़ जाए कि वाकई साहब के रसूख के आगे खबरों की कलम भी थम सकती है क्या? किस्सा साहब खुद ही सुना रहे हैं कि इंदौर में पदस्थापना के दौरान उनके विभाग में कथित गड़बड़ियों को लेकर एक मीडिया कर्मी ने खबरें प्रकाशित कर दी थीं।

साहब के मुताबिक, उन्होंने ऐसा रौब दिखाया कि मीडिया वाले की कॉलर तक पकड़ ली और उसके बाद खबरें आना बंद हो गईं। अब यह किस्सा कितना सच और कितना साहब की अपनी बातोलेबाजी है, यह तो साहब ही बेहतर जानें। मगर बैतूल की पदस्थापना में कहानी कुछ उल्टी पटकथा लिखती नजर आ रही है। साहब के अधीनस्थ कार्यालय को लेकर लगातार खबरें सामने आ रही हैं।

मामला बढ़ा तो प्रशासन ने भी जांच बैठा दी। अब न कॉलर पकड़ने की बात हो रही है, न खबरें रोकने की कोई जुगत काम आती दिख रही है। उलटे साहब को इधर-उधर के चक्कर काटते देखा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जिस विभाग में साहब वर्षों से अपनी मजबूत पकड़ के लिए चर्चित रहे हैं, उसी विभाग से जुड़े मामलों पर अब प्रशासनिक नजर पड़ गई है। कलेक्टर स्तर से जांच शुरू होने के बाद साहब की बातों का असर कितना है और फाइलों का वजन कितना, यह जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा फिलहाल विभागीय गलियारों में एक ही चर्चा है।

इंदौर में कॉलर पकड़ने वाला किस्सा यहां खबरों की बाढ़ के सामने क्यों नहीं चल पाया? शायद इसलिए कि यहां मामला किसी एक खबर का नहीं, बल्कि लगातार उठ रहे सवालों और अब शुरू हुई प्रशासनिक जांच का है। साहब की बातोलेबाजी फिलहाल चर्चा में है, लेकिन असली जवाब जांच की रिपोर्ट देगी।

थाने की कुर्सी के लिए फिर शुरू हुई लॉबिंग

मुख्यालय में पदस्थ एक टीआई इन दिनों फिर से मैदानी थाने की कुर्सी के लिए जोर आजमाइश में जुटे बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि साहब की नजर मुलताई के साथ पुराने और पड़ोसी थाने अथवा आमला थाने पर है। इसके लिए साहब ने अपनी ओर से ‘मैनेजमेंट’ भी शुरू कर दिया है और बॉस की खुशामद से लेकर उनकी हर शर्त मानने तक को तैयार बताए जा रहे हैं। मगर पेंच यह है कि साहब के खिलाफ गंभीर मामलों से जुड़ी जांचें अभी लंबित बताई जा रही हैं। ऐसे में नई जिम्मेदारी देने का फैसला आसान नहीं है। यही वजह है कि बॉस भी पूरे मामले में फूंक-फूंककर कदम रखते नजर आ रहे हैं। एक तरफ साहब की थाने में वापसी की कोशिशें तेज हैं, तो दूसरी तरफ लंबित जांचों की फाइलें रास्ते में खड़ी दिखाई दे रही हैं।

चर्चा यह भी है कि साहब को मैदानी पोस्टिंग का खासा अनुभव है और पुराने इलाके में वापसी के लिए वे लगातार संपर्क साध रहे हैं। पसंदीदा थाने की कुर्सी मिल जाए तो इसके लिए साहब किसी भी तरह की शर्त स्वीकार करने को तैयार बताए जा रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला बॉस के हाथ में है और बॉस फिलहाल जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रहे। अब देखना यह है कि लंबित जांचों का पलड़ा भारी रहता है या साहब की लॉबिंग आखिरकार रंग लाती है। फिलहाल पुलिस महकमे में चर्चा यही है कि कुर्सी की चाहत तेज है, लेकिन फाइलों की रफ्तार उससे भी ज्यादा मायने रखती है।

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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