Betul Ki Khabar: रजिस्ट्री के बाद सर्विस प्रोवाइडरों को अलग कमरे में क्यों ले जाया जाता है?

नामों के अंतर वाली रजिस्ट्री पर फाइल तलब होने के बाद रजिस्ट्री कार्यालय में हलचल; बंद कमरे में होने वाली गतिविधियों को लेकर उठे सवाल, आकस्मिक जांच से साफ हो सकती है तस्वीर
Betul Ki Khabar: बैतूल। रजिस्ट्री कार्यालय में दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर उठे सवालों के बीच अब कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर एक और चर्चा सामने आई है। आधार में ‘अजयÓ और खसरे में ‘अज्जूÓ नाम होने के बावजूद रजिस्ट्री होने के मामले में कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे द्वारा फाइल तलब किए जाने के बाद कार्यालय में हलचल बढ़ी है। इसी बीच सर्विस प्रोवाइडरों को रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार्यालय के एक अलग कमरे में ले जाने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
कार्यालय से जुड़े लोगों के बीच चर्चा है कि रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कुछ सर्विस प्रोवाइडर अलग कमरे में जाते हैं, जहां कार्यालय के कुछ कर्मचारी भी मौजूद रहते हैं। सवाल यह है कि इस कमरे में होने वाली प्रक्रिया क्या है और इसे मुख्य रजिस्ट्री प्रक्रिया से अलग रखने की जरूरत क्यों पड़ती है? हालांकि इस कमरे में किसी तरह के लेनदेन होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। यदि यहां किसी प्रकार की अतिरिक्त राशि के लेनदेन का आरोप है तो उसकी पुष्टि सिर्फ निष्पक्ष जांच या रिकॉर्ड की पड़ताल से ही हो सकती है।
कलेक्टर की एक आकस्मिक जांच खोल सकती है कई परतें
नामों में अंतर वाली रजिस्ट्री की फाइल तलब किए जाने के बाद अब निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। ऐसे में यदि कलेक्टर या सक्षम अधिकारी अचानक रजिस्ट्री कार्यालय पहुंचकर संबंधित कमरे, रजिस्ट्री प्रक्रिया, सर्विस प्रोवाइडरों की गतिविधियों और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करें तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। जांच में यह भी देखा जा सकता है कि रजिस्ट्री के बाद सर्विस प्रोवाइडरों को किस प्रक्रिया के तहत अलग कमरे में ले जाया जाता है, वहां कौन-कौन से कर्मचारी मौजूद रहते हैं और वहां कोई आधिकारिक कार्य होता है या नहीं।
पहले नामों का अंतर, अब बंद कमरे की चर्चा
एक तरफ अलग-अलग दस्तावेजों में नाम अलग होने के बावजूद पंजीयन होने का मामला प्रशासन के सामने है, वहीं दूसरी ओर कार्यालय की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही चर्चाओं ने सवालों को और बढ़ा दिया है। अब गेंद कलेक्टर के पाले में है। यदि जांच निष्पक्ष और आकस्मिक तरीके से होती है तो यह साफ हो सकता है कि कार्यालय में चल रही चर्चाओं में कितना दम है और कौन-सी बातें महज अफवाह हैं। फिलहाल सवाल एक ही है—रजिस्ट्री के बाद उस कमरे का राज क्या है? जांच की दस्तक पहुंचेगी तो तस्वीर खुद-ब-खुद साफ हो जाएगी।
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