Politics: राजनीतिक हलचल: पद की कुर्बानी या पुत्र मोह को लेकर चर्चा क्यों तेज?? सियासत के इस पुराने फार्मूले से थिंक टैंक क्यों परेशान??? किस नेताजी ने सैर सपाटे में भी जमाई झांकी???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

पद की कुर्बानी या पुत्र-मोह को लेकर चर्चा तेज
सियासी गलियारों में इन दिनों एक व्यवसायिक संगठन की प्रदेश स्तरीय नियुक्ति को लेकर खूब कानाफूसी है। चर्चा है कि एक पिता को अपने ही पुत्र की महत्वाकांक्षा के आगे पद की कुर्बानी देनी पड़ी। मामला यहीं खत्म नहीं होता। संगठन के जानकारों की मानें तो पिता पद छिनने की कसक से परेशान हैं तो पुत्र भी अपनी राजनीतिक-संगठनात्मक जमीन मजबूत किए बिना बड़े पद की चाह में बेचैन नजर आ रहा है।
चर्चा तो यहां तक है कि पिता की पीड़ा पद जाने की है और पुत्र की बेचैनी पद पाने की। दोनों तरफ महत्वाकांक्षा का तापमान बढ़ा हुआ है, फर्क सिर्फ इतना है कि एक कुर्सी छूटने से खफा है और दूसरा कुर्सी तक पहुंचने की जल्दबाजी में। संगठन में नियुक्ति के बाद अब सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या प्रदेश स्तरीय पद योग्यता और अनुभव से तय होगा या फिर पारिवारिक प्रभाव और महत्वाकांक्षा से हालांकि संगठन के भीतर कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है, लेकिन बंद कमरों की चर्चाओं में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर खूब चटखारे लिए जा रहे हैं।
फिलहाल मामला पद का कम और प्रतिष्ठा, महत्वाकांक्षा और परिवार के भीतर चल रही खींचतान का ज्यादा नजर रहा है। कुर्सी किसके हिस्से आती है, यह तो संगठन तय करेगा, लेकिन फिलहाल पिता-पुत्र दोनों की बेचैनी ने संगठन की राजनीति में जरूर गर्मी बढ़ा दी है।
सियासत का पुराना फॉर्मूला, थिंक टैंक भी परेशान!
राजनीतिक गलियारों में एक विपक्षी दल के प्रमुख की कार्यशैली को लेकर चर्चाओं का दौर है। कहा जा रहा है कि अपनी जन उपयोगिता और योग्यता साबित करने के बजाय उनका ज्यादा जोर इस बात पर रहता है कि विरोधियों को कैसे घेरा जाए और उनके खिलाफ कौन सा नया सियासी पेंच चला जाए। लेकिन अब उनके पुराने राजनीतिक दांव पहले जैसी धार नहीं दिखा रहे हैं और रणनीति की पोल भी धीरे-धीरे खुल चुकी है।
दिलचस्प यह है कि अध्यक्ष का थिंक टैंक भी लगातार पिट रहे इन फॉर्मूलों से परेशान बताया जा रहा है। अंदरखाने सलाह दी जा रही है कि सिर्फ प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया में बयानबाजी से राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं होगी।
इसके लिए जनता के बीच जाना, जनहित के मुद्दे उठाना और अपनी उपयोगिता साबित करना जरूरी है, लेकिन अध्यक्ष महोदय फिलहाल अपने अहंकार के आगे सलाहकारों की सलाह को भी तवज्जो देते नजर नहीं आ रहे। ऐसे में संगठन के भीतर सवाल उठ रहा है कि आखिर कब रणनीति बदलेगी और कब राजनीति विरोधियों को घेरने से निकलकर जनता के मुद्दों तक पहुंचेगी। अब देखना दिलचस्प होगा कि अध्यक्ष थिंक टैंक की सुनते हैं या फिर पिटे हुए पुराने फॉर्मूले को ही नए पैकेज में पेश करने का सिलसिला जारी रखते हैं।
सैर-सपाटे में भी ‘जमी झांकीÓ, प्रोटोकॉल ने बढ़ाई नेताजी की रंगत!
जिले की सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता को आयोग में एडजस्ट करते हुए राज्यमंत्री का दर्जा क्या मिला, नेताजी की सक्रियता के चर्चे और तेज हो गए। अब उनकी सियासी सक्रियता के साथ-साथ सैर-सपाटे में भी ‘प्रोटोकॉल वाली झांकीÓ जमने की चर्चा है। हाल ही में नेताजी मित्र मंडली के साथ धार्मिक यात्रा पर निकले।
दूसरे राज्य में पहुंचे तो राज्यमंत्री का दर्जा काम आया और प्रोटोकॉल के तहत सर्किट हाउस में कमरा मिल गया। इसके बाद स्थानीय अधिकारियों ने स्वागत-सत्कार भी कर दिया। बस फिर क्या था, स्वागत की तस्वीरें कैमरे में कैद हुईं और सोशल मीडिया की गलियों में भी घूमने लगीं। चर्चा करने वाले कह रहे हैं कि यात्रा धार्मिक थी, लेकिन प्रोटोकॉल ने इसे थोड़ा राजनीतिक रंग दे दिया।
जिस संगठन से नेताजी जुड़े हैं, वहां दिखावे से दूर रहने की नसीहत लगातार दी जाती रही है। पार्टी नेतृत्व सादगी और जमीन से जुड़े रहने की बात करता है, लेकिन नेताजी तो शायद एक कदम आगे निकलकर प्रोटोकॉल को भी उपलब्धि की तरह दिखाने में जुट गए। अब समर्थक इसे सम्मान बता रहे हैं तो विरोधी इसे ‘दिखावे की राजनीतिÓ का नाम दे रहे हैं। नेताजी की यात्रा भले ही धार्मिक रही हो, लेकिन लौटते-लौटते जिले की सियासत में चर्चा के लिए एक नया किस्सा जरूर छोड़ गई।




