Betul Samachar: नानू तो सिर्फ मोहरा! रजिस्ट्रार कार्यालय में बिना चढ़ावे नहीं बढ़ती फाइल?

300 की नकल पर 1500 की वसूली के आरोप के बाद उठे बड़े सवाल, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा था खेल?
Betul Samachar: बैतूल। उप पंजीयक कार्यालय में 300 रुपए की सत्यापित नकल के लिए 1500 रुपए तक वसूले जाने के आरोपों ने अब पूरे कार्यालय की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक अस्थाई कर्मचारी इतने दिनों तक खुलेआम वसूली करता रहा तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक नहीं थी, या फिर सब कुछ उनकी जानकारी में चल रहा था?
दरअसल, नकल शाखा में पदस्थ अस्थाई कर्मचारी नानू पर निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक राशि लेने के आरोप सामने आने के बाद मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन अब लोगों का कहना है कि नानू सिर्फ एक चेहरा था, असली सवाल यह है कि उसके पीछे कौन था और कथित वसूली की रकम आखिर पहुंच कहां रही थी?
सर्विस प्रोवाइडरों के भरोसे पूरा सिस्टम
उप पंजीयक कार्यालय में रजिस्ट्री से जुड़े अधिकांश काम सर्विस प्रोवाइडरों के माध्यम से कराए जाते हैं। जमीन, मकान और अन्य संपत्तियों की खरीदी-बिक्री कराने वाले लोग सीधे कार्यालय के बजाय इन्हीं के माध्यम से प्रक्रिया पूरी करते हैं। ऐसे में वर्षों से यह चर्चा आम है कि शासकीय शुल्क के अलावा भी एक अलग व्यवस्था चलती है, जिसके बिना कई मामलों में फाइलों की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।
नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कई लोगों ने बताया कि कार्यालय में काम जल्दी और बिना अड़चन के कराने के लिए अतिरिक्त राशि देना लगभग सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है। आम आदमी को यह तक पता नहीं होता कि वह शासकीय शुल्क जमा कर रहा है या किसी अनौपचारिक व्यवस्था का हिस्सा बन रहा है।
नकल कांड ने खोल दी अंदर की परतें
300 रुपये की नकल के लिए 1500 लेने के आरोप कोई साधारण मामला नहीं हैं। शिकायतों में हस्ताक्षर, रसीद और पुराने रिकॉर्ड निकालने के नाम पर अलग-अलग राशि लिए जाने की बातें भी सामने आई हैं। यदि यह सच है तो सवाल उठता है कि एक अस्थाई कर्मचारी को इतनी छूट किसने दी? क्या वह अपने स्तर पर यह सब कर रहा था या फिर उसे मौन सहमति प्राप्त थी? सूत्रों का कहना है कि कार्यालय में वर्षों से काम करने वाले लोग व्यवस्था की हर कमजोर नस से परिचित रहते हैं। ऐसे में बिना किसी संरक्षण के इस तरह की गतिविधियां लंबे समय तक चल पाना मुश्किल माना जा रहा है।
जिम्मेदारी से बच नहीं सकते अधिकारी
मामले के सामने आने के बाद अधिकारियों ने जांच की बात कही है, लेकिन लोगों का कहना है कि जांच केवल नानू तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि बाबू की अनुपस्थिति में उसे किस अधिकार से काम करने दिया गया, रिकॉर्ड तक उसकी पहुंच कैसे बनी रही और आम नागरिकों से ली गई कथित अतिरिक्त राशि का लाभ किसे मिल रहा था।
यदि जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर कार्रवाई तक सीमित रही तो पूरा सच सामने नहीं आ पाएगा। जांच का दायरा कार्यालय की पूरी कार्यप्रणाली, रिकॉर्ड प्रबंधन और शुल्क वसूली की व्यवस्था तक बढ़ाना होगा।
स्थानीय नागरिकों और रजिस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए जिला प्रशासन को सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए। लोगों का मानना है कि यदि उप पंजीयक कार्यालय में होने वाले लेन-देन, नकल शाखा की कार्यप्रणाली और सर्विस प्रोवाइडरों की भूमिका की गहन जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
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