Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: वर्दी वाले विभाग की मीडिया से यह कैसी दूरी?? हरे भरे विभाग में क्यों बम रहे तू डाल-डाल, मैं पात-पात के हालात??? किस थानेदार को बड़े थाने की कसक मार रही हिलोरे???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..

मीडिया से यह कैसी दूरी…?
जिले के वर्दी वाले महकमे और मीडिया के रिश्तों में इन दिनों कुछ ज्यादा ही सोशल डिस्टेंसिंग देखने को मिल रही है। जानकार बताते हैं कि कभी ऐसा दौर था जब छोटे-बड़े हर मामले में कंट्रोल रूम में प्रेस कॉन्फ्रेंस सज जाया करती थी। मीडिया के साथी भी मौके पर सवालों की झड़ी लगा देते थे और अधिकारी जवाबों की, लेकिन अब तस्वीर बदली-बदली सी है।
बड़े-बड़े खुलासे, कार्रवाई और उपलब्धियां सीधे प्रेस नोट के रास्ते मीडिया तक पहुंच रही हैं। यदि किसी पत्रकार को किसी खबर में जरा भी शंका हो जाए, तो फिर अधिकारियों के मोबाइल की घंटियां ही सच जानने का एकमात्र जरिया बचती हैं। गलियारों में चर्चा यह भी है कि महकमे ने मीडिया से यह दूरी कोई यूं ही नहीं बनाई है।
चटखारे लेकर लोग कह रहे हैं कि करोड़ों के बजट वाले विभाग में फिलहाल इतना बजट नहीं बचा कि प्रेस वार्ता के साथ होने वाले चाय-नाश्ते की परंपरा निभाई जा सके। लिहाजा समाधान यह निकाला गया कि जब मुलाकात ही नहीं होगी, तो चायपान का खर्च भी नहीं होगा।
अब असल वजह क्या है, यह तो विभाग ही जाने, लेकिन मीडिया जगत में इस नई व्यवस्था को लेकर खूब कानाफूसी जरूर हो रही है। आखिर खबरों के साथ चाय की चुस्कियां भी तो रिश्तों में मिठास घोलने का काम करती हैं।
तू डाल-डाल, मैं पात-पात!
जिले के एक हरे-भरे विभाग में इन दिनों दोहरी कार्यशैली की चर्चा खूब है। मामला यह है कि शिकायतें लगभग एक जैसी प्रकृति की थीं, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार और अंदाज में जमीन-आसमान का फर्क देखने को मिला। एक तरफ एक साहब ने शिकायत आते ही फाइलों में धूल जमने नहीं दी।
जांच टीम बनी रिपोर्ट आई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी हो गई। विभागीय गलियारों में इसे एक्शन मोड प्रशासन का उदाहरण बताया जा रहा है। दूसरी तरफ दूसरे साहब के यहां शिकायतों की फाइलें मानो लंबी छुट्टी पर चली गईं। समय बीतता रहा, शिकायतकर्ता इंतजार करते रहे, लेकिन जांच की गाड़ी स्टार्ट होने का संकेत तक नहीं मिला। नतीजा यह कि अब सवाल कार्रवाई से ज्यादा उसकी अनुपस्थिति पर उठ रहे हैं।
विभाग के जानकार चुटकी ले रहे हैं कि एक ही विभाग में दो तरह के कैलेंडर चल रहे हैं, एक में 15 दिन काफी हैं तो दूसरे में कई महीने भी कम पड़ रहे हैं। कर्मचारी और शिकायतकर्ता भी समझ नहीं पा रहे कि आखिर नियमों की किताब एक है या उसकी अलग-अलग संस्करण बाजार में आ चुके हैं।
अब चर्चा इस बात की नहीं कि शिकायत किसकी थी, बल्कि इस बात की है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का तापमान अलग-अलग कमरों में अलग क्यों है? फिलहाल विभागीय गलियारों में यही फुसफुसाहट है कि जहां मंशा तेज, वहां जांच तेज, जहां मंशा ढीली, वहां फाइलें भी सुस्त।
बड़े थाने की कसक मार रही हिलोरे
एक मुख्यालय के बड़े और मलाईदार माने जाने वाले थाने की कुर्सी पर कुछ दिनों तक विराजमान रहने के बाद एक थानेदार साहब इन दिनों खासे बेचैन बताए जा रहे हैं। वजह यह कि बड़ी जिम्मेदारी का स्वाद चखने के बाद उन्हें शहर से कुछ दूरी पर स्थित अपेक्षाकृत छोटे थाने की कमान सौंप दी गई। तब से साहब का मन न नए थाने में रम रहा है और न ही पुरानी यादें उनका पीछा छोड़ रही हैं।
चर्चा है कि शाम ढलने के बाद होने वाली बैठकों में साहब अपने दिल का दर्द साझा करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। कभी बड़े थाने के रुतबे की चर्चा होती है तो कभी वहां की व्यस्तता और अहमियत के किस्से सुनाए जाते हैं। सुनने वाले भी मुस्कुराकर सिर हिला देते हैं, लेकिन साहब की कसक कम होने का नाम नहीं ले रही। चर्चा है कि बड़े साहब की नजरों में फिर से जगह बनाने के लिए थानेदार अपने क्षेत्र में होने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं पर बाज जैसी नजर रखे हुए हैं।
किसी वारदात का खुलासा हो या कोई कार्रवाई, हर उपलब्धि को बड़े मंच तक पहुंचाने की पूरी कोशिश की जा रही है। मगर किस्मत फिलहाल साथ देती नजर नहीं आ रही। पुलिस गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि साहब का दिल अभी भी पुराने थाने की चारदीवारी में ही अटका हुआ है। लोग कह रहे हैं कि कुर्सी भले बदल गई हो, लेकिन बड़े थाने का सपना अभी भी साहब के दिल और डायरी दोनों में जिंदा है।
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