Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: कौनसे नए साहब के पुराने रिश्ते और नई उम्मीद की हो रही चर्चा?? मैडम का पारा और जनसुनवाई की गर्मी… आखिर क्या है माजरा??? कौनसी मैडम है, जिनकी अपने कॉलेज में बोल रही तूती???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना……..

नए साहब, पुराने रिश्ते और नई उम्मीदें…
जिले की पुलिस व्यवस्था में जल्द ही एक नए साहब की आमद होने वाली है। पड़ोसी जिले के रहने वाले या साहब तबादला होकर आ रहे हैं, लेकिन उनके आने से पहले ही जिले में चर्चाओं का बाजार गर्म है। खासकर एक समाज विशेष के कुछ लोग साहब की कार्यशैली से ज्यादा उनके सामाजिक और पारिवारिक कनेक्शन तलाशने में जुट गए हैं। कोई दूर की रिश्तेदारी निकाल रहा है तो कोई सामाजिक मंचों के पुराने परिचय की फाइलें खंगाल रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि साहब ने अभी जिले की सीमा भी पार नहीं की है और इधर कई लोग अपने-अपने हिसाब से नजदीकियां साबित करने में लगे हैं। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो चाय की गुमटी से लेकर वातानुकूलित दफ्तरों तक यह बताने में व्यस्त हैं कि उनका साहब से पुराना परिचय है। हालांकि यह अलग बात है कि परिचय कितना पुराना और कितना पक्का है, इसकी पुष्टि कोई नहीं कर पा रहा।
उधर पुलिस महकमे से मिल रही फीडबैक कुछ अलग ही कहानी कहती है। चर्चा है कि नए साहब मितभाषी स्वभाव के हैं। ज्यादा बोलने की बजाय काम पर भरोसा करते हैं और अनावश्यक मेल-मुलाकातों से दूरी बनाए रखते हैं। यही वजह है कि जो लोग अभी से समीकरणों की गणित लगा रहे हैं, उन्हें आने वाले दिनों में थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है।
पुलिस महकमे में चर्चा है कि साहब की कार्यशैली रिश्तेदारी, परिचय और सामाजिक समीकरणों से ज्यादा फाइलों और तथ्यों पर आधारित रहती है। ऐसे में कई स्वयंभू करीबी लोगों की उम्मीदों पर पानी भी फिर सकता है। फिलहाल तो जिले में नए साहब के स्वागत से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर कौन-कौन उनके सबसे करीबी निकलते हैं। अब देखना यह है कि साहब की कुर्सी संभालने के बाद रिश्तों की यह फेहरिस्त कितनी लंबी चलती है और कितने लोग खुद को वास्तव में पहचान वाले साबित कर पाते हैं।
मैडम का पारा और जनसुनवाई की गर्मी…
इन दिनों एक महिला अधिकारी का मिजाज प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। कहा जा रहा है कि मैडम का पारा मौसम के तापमान से भी तेज चढ़ता-उतरता है। फाइलों से लेकर फरियादियों तक, हर कोई उनके मूड का अनुमान लगाने में जुटा रहता है।
ताजा किस्सा मंगलवार की जनसुनवाई का बताया जा रहा है। एक मामले की जांच और उससे जुड़ी शिकायत को लेकर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे एक फरियादी पर मैडम का गुस्सा फूट पड़ा। दिलचस्प बात यह रही कि जिस शिकायत को लेकर मैडम नाराज थीं, वह शिकायत उस फरियादी ने की ही नहीं थी। बेचारा तो सिर्फ अपनी बात रखने और न्याय की गुहार लगाने आया था, लेकिन गाज उस पर ही गिर गई।
जनसुनवाई में मौजूद लोगों का कहना है कि फरियादी पहले तो समझ ही नहीं पाया कि आखिर उसकी गलती क्या है। वह अपनी समस्या बताने की कोशिश करता रहा और मैडम अपनी नाराजगी जाहिर करती रहीं। कुछ देर के लिए माहौल ऐसा बन गया कि लोगों को लगा मानो शिकायतकर्ता कोई और नहीं, वहीं फरियादी हो।
वैसे प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि मैडम आम लोगों से बातचीत में बहुत ज्यादा सहज नहीं मानी जाती। कई लोगों का अनुभव है कि सीधे मुंह दो बातें कर लेना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं होता। ऐसे में जनसुनवाई में पहुंचने वाले फरियादी पहले अपनी समस्या कम और मैडम का मूड ज्यादा भांपने की कोशिश करते हैं।
मैडम का महाविद्यालय, मैडम के नियम!
जिले के एक प्रमुख महाविद्यालय की प्राचार्य इन दिनों अपने शैक्षणिक नवाचारों से कम और तेवरों से ज्यादा चर्चा में हैं। कभी सौम्य और शालीन छवि के लिए पहचानी जाने वाली मैडम का नया अवतार अधीनस्थ कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच खासा चर्चित है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि कॉलेज परिसर में अब विषयों से ज्यादा चर्चा मैडम के मूड और आदेशों की होती है।
कहते हैं कि ऊपर से चाहे विश्वविद्यालय के अधिकारी सलाह दें या विभागीय अफसर ताकीद करें, मैडम अपनी ही धुन में रहती हैं। कॉलेज में कौनसा नियम चलेगा और कौन-सा नहीं, इसका फैसला मानो नियम पुस्तिका नहीं बल्कि मैडम का मनोविज्ञान तय करता हो। यही वजह है कि उनके कुछ फैसलों को लोग अब शैक्षणिक आदेश कम और तुगलकी फरमान ज्यादा कहने लगे हैं।
ताजा चर्चा एक विषय को बंद करने के निर्णय को लेकर है। बताया जाता है कि इस मुद्दे पर जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष स्वयं चर्चा करने पहुंचे थे। उम्मीद थी कि विद्यार्थियों के हितों और भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई सकारात्मक रास्ता निकलेगा, लेकिन वहां भी मैडम ने नियम-कायदों का ऐसा पाठ पढ़ाया कि अध्यक्ष महोदय को खाली हाथ लौटना पड़ा। कॉलेज के गलियारों में चर्चा है कि बातचीत से ज्यादा नियमों की धाराएं चलीं।
मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि संबंधित विषय बंद होने से सैकड़ों विद्यार्थियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है। छात्र और अभिभावक अपने स्तर पर चिंता जता रहे हैं, लेकिन चर्चा यह है कि मैडम फिलहाल किसी भी विरोधी राय को सुनने के मूड में नहीं हैं। उनका मानना है कि जो फैसला हो गया, वह हो गया।
अब प्रशासनिक और शैक्षणिक हलकों में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर महाविद्यालय छात्रों के लिए चलता है या नियमों की ऐसी व्याख्या के लिए, जिसमें संवाद की गुंजाइश खत्म हो जाए। फिलहाल कॉलेज में यही कानाफूसी है कि यहां पाठ्यक्रम भले विश्वविद्यालय तय करे, लेकिन अंतिम अध्याय मैडम ही लिखना चाहती हैं।
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