Betul News : बैतूल में तबादला एक्सप्रेस में अधिकारी बने पावरफुल
Betul News: Officers become powerful in Betul's Transfer Express

जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कहीं विस्फोटक रूप धारण न कर ले, कई कार्यकर्ता भी तबादलों से नाखुश
Betul News : बैतूल। जिले में अफसरशाही जनप्रतिनिधियों पर हावी है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कई ऐसे अवसर सामने आए हैं, जब जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं का दरकिनार कर अफसरों ने अपनी चलाई है। ताजा मामला 1 मई से 17 जून तक हुए तबादलों को लेकर सामने आया है। खबर है कि जिले के सांसद और पांचों विधायकों के अलावा जिला पंचायत अध्यक्ष की भी तबादलों में अधिकारियों ने अनदेखी की है। इतना जरूर है कि तबादलों में जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाओं का ध्यान रखा है, लेकिन अधिकांश तबादले विभाग प्रमुखों ने अपने पावर दिखाकर किए हैं, इससे जिले में विधायकों की नाराजगी कहीं विस्फोटक रूप धारण न कर ले। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सूत्र बताते हैं डेढ़ माह तक राज्य शासन ने प्रादेशिक और जिला स्तर पर तबादलों के नियम शिथिल किए थे। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि जिला स्तर पर सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष और अन्य जनप्रतिनिधियों को पूरी तवज्जों देकर तबादले किए जाए। इसका अधिकांश जिलों में पालन हुआ, लेकिन बैतूल जिला अछूता कहा जा सकता है। जहां अधिकारियों के पावरफुल होने से कई जनप्रतिनिधि अपनी अनुशंसा पर संबंधित कर्मचारियों का मनचाह स्थान पर तबादला नहीं करवा पाए। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले में सांसद और पांचों विधायक भाजपा के होने के बावजूद अफसरशाही किस तरह हावी है। वैसे सूत्र बताते हैं कि इसके पहले भी अफसर जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर चुके हैं। इससे गलत मैसेज भी जाने की खबर है।
सूची जारी हुई तो मचा बवाल
सूत्र बताते हैं कि तबादला एक्सप्रेस में कई विभागों की सूची बारी-बारी से जारी हो गई है। इस सूची में मनचाहे स्थान पर सांसद और विधायकों ने अनुशंसा भी की थी, लेकिन सत्तर प्रतिशत मामलों में सत्यतता सामने आई है कि अधिकारियों ने खुलेआम अनदेखी की है। इस बात से साफ जाहिर है कि सत्तारूढ़ पार्टी के जनप्रतिनिधि होने के बावजूद अधिकारियों के पावरफुल होने से नाराजगी भी बढ़ रही है। सूत्र तो यह भी बताते हैं कि कई कार्यकर्ताओं ने अपने करीबियों और रिश्तेदारों के तबादलों के लिए जनप्रतिनिधियों को नाम भेजे थे, लेकिन जब तबादला सूची जारी हुई तो उनके नाम गायब थे। जनप्रतिनिधियों को भी अफसरशाही के हावी होने से कार्यकर्ताओं को जवाब देना मुश्किल हो रहा है।
यह दो उदाहरण समझने के लिए काफी
वैसे तो जिले में अफसरशाही हावी होने के कई मामले सामने आए है, लेकिन तबादला सूची में दो मामले ऐसे हैं, जिन पर गौर करें तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य मामले में अधिकारी ने किस तरह से अपनी मनोपल्ली चलाई है। पहला उदाहरण वन विभाग का सामने आया है, यहां पर एक वनपाल ने अपने पिता के देहांत के बाद माता की सेवा और बीमारी के कारण एक वन मंडल से कार्ययोजना में तबादला करने का अनुरोध किया था, इसके लिए उन्होंने सांसद और क्षेत्रीय विधायक अनुशंसा भी कराई, लेकिन डीएफओ ने अपनी मनोपल्ली चलाकर विधायक तक को गुमराह कर दिया कि कर्मचारी का रिकार्ड अच्छा है, उसे स्थानांतरित नहीं कर सकते हैं।
यहां कर्मचारी की माता के स्वास्थ्य को दरकिनार कर तबादला सूची जारी हुई तो उसी रेंज में दूसरे स्थान पर पदस्थ कर सांसद-विधायक के आदेश की खुली अवहेलना की। दूसरा उदाहरण स्वास्थ्य विभाग की एक एएमओ ने भीमपुर से सेहरा करने का आग्रह किया था। उन्होंने अपनी समस्या का हवाला देते बताया था कि उनके पति दूसरी जगह पदस्थ है और उनके सात माह के पुत्र की देखभाल के लिए उनका पास रहना जरूरी है, लेकिन पहली सूची में उनका नाम विधायक की अनुशंसा के बाद भी नहीं आया।
दूसरी मर्तबा केंद्रीय मंत्री और क्षेत्रीय सांसद ने उनकी समस्या को देखते हुए तबादले की अनुशंसा की तो विभागीय अधिकारियों ने यह कहकर तबादले से इंकार कर दिया कि शीर्ष अधिकारी ने तबादला प्रतिबंधित कर दिया है। मन मसोजकर महिला कर्मचारी अब अपनी समस्या के साथ पुराने स्थान पर ही ड्यूटी कर रही है।




