Politics: राजनीतिक हलचल: मैडम का पार्ट वन का जलवा, पार्ट टू में फीका क्यों?? किस के गृह जिले में सत्ता की खुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही??? दिल्ली दरबार मे हाजिरी, आंदोलन से क्यों बनाई दूरी???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में….

पार्ट वन का जलवा, पार्ट टू में फीका पड़ा सिक्का!

आरक्षित क्षेत्र की नौकरी छोडक़र राजनीति के मैदान में उतरीं नेत्री को पार्ट वन में जो तवज्जो मिली थी, पार्ट टू में वैसा जलवा नजर नहीं आ रहा। सियासत के इस दूसरे एपिसोड में न तो पहले जैसी चमक दिख रही है और न ही उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाली पिछलग्गू मीडिया का वैसा जमावड़ा। चर्चाओं के बाजार में इसके पीछे कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि पिछली बार माहौल बनाने में बटुए ने भी अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन इस बार बटुआ कुछ ज्यादा ही खामोश है।

वहीं, कुछ राजनीतिक पंडितों का आकलन है कि मामला सिर्फ बटुआ बंद होने का नहीं, बल्कि उसमें पहले जितना वजन बचा होने का भी है। बहरहाल, राजनीति में रिश्ते भी मौसम की तरह रंग बदलते हैं। जब तक संसाधनों की धूप खिलती है, समर्थकों की छतरियां तनी रहती हैं। धूप कमजोर पड़ते ही कई छतरियां अपने आप दूसरी दिशा में घूम जाती हैं। अब देखना यह है कि नेत्री पार्ट टू में अपना पुराना रुतबा वापस ला पाती हैं या फिर सियासी पटकथा में अगला मोड़ किसी और के नाम होगा!

गृह जिले में सत्ता की खुमारी, जनता का मिजाज पढऩे में फेल!

सत्ता पक्ष के प्रदेश प्रमुख का गृह जिला होने के बावजूद संगठन से लेकर जनप्रतिनिधियों तक सत्ता की खुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही। हर कोई अपनी ही धुन में मगन है और मुगालते की ऐसी पट्टी बांधे बैठा है कि जनता के बदलते मिजाज की आहट तक सुनाई नहीं दे रही। यह आकलन किसी विपक्षी नेता का नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के ही एक बुद्धिजीवी समर्थक का है। उनका मानना है कि मौसम वैज्ञानिक प्रजाति का सत्ता के प्रति बदलता व्यवहार इस बात का सबसे बड़ा सिम्टम्स है।

जो कल तक सत्ता की परिक्रमा में व्यस्त थे, उनके सुर बदलने लगे हैं, लेकिन स्थानीय सत्ताधीश इसे सामान्य मौसमी बदलाव मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं। सियासत में मौसम बदलने से पहले हवाओं का रुख बदलता है। समझदार नेता इन हवाओं से खतरा भांप लेते हैं, जबकि मुगालते में जीने वाले आंधी आने के बाद भी अपनी कुर्सी की मजबूती गिनाते रहते हैं। अब देखना यह है कि सत्ता के स्थानीय कर्णधार जनता का बदलता मिजाज पढ़ते हैं या फिर वक्त ही उन्हें सियासी आईना दिखाएगा!

दिल्ली दरबार में हाजिरी, आंदोलन से दूरी!

पिछले दिनों विपक्षी नेता दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे। वहां फोटो सेशन हुआ, सोशल मीडिया पर सक्रियता का बखान भी जमकर किया गया और अगले ही दिन वापसी की राह पकड़ ली। लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि किसी वरिष्ठ नेता के साथ पैदल मार्च करते हुए उनकी तस्वीर नजर क्यों नहीं आई? बस, इसी सवाल ने दिल्ली दौरे की गंभीरता पर सवालिया निशान लगा दिए। अब विरोधियों को चुटकी लेने का मौका मिल गया है।

चर्चा है कि कहीं यह दौरा आंदोलन से ज्यादा अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की औपचारिकता तो नहीं था? सियासी तंज कसने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि संघर्ष की राह पर ज्यादा आगे बढऩे से कहीं पुलिसिया कार्रवाई का सामना न करना पड़ जाए, इसी आशंका में वापसी बेहतर समझी गई, लेकिन राजनीतिक हलचल में सवाल यही है कि दिल्ली गए थे आंदोलन करने या सोशल मीडिया की गैलरी सजाने? तस्वीरें तो खूब चमकीं, मगर संघर्ष की पटकथा अधूरी ही रह गई!

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Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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