Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: किस कॉलेज में प्रोफेसर की सलाह पर चल रहा कॉलेज का कारवां?? बड़े साहब और कोने की चर्चा के क्या मायने??? किस जगह कुर्सी के कई दावेदार थे, बाजी युवा साहब कैसे मार गए???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में……

प्रोफेसर की सलाह पर चल रहा कॉलेज का कारवां

जिले के एक प्रमुख महाविद्यालय में इन दिनों प्रभारी प्राचार्य की कार्यशैली को लेकर स्टाफ के बीच तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कुछ वर्ष पहले प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी संभालने वाली मैडम के व्यवहार और निर्णय लेने के तरीके को लेकर कर्मचारियों में असंतोष की बातें सामने आ रही हैं।

चर्चा है कि संवाद की कमी के कारण स्टाफ के साथ-साथ विद्यार्थियों को भी कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। महाविद्यालय के गलियारों में एक रसायन शास्त्र के प्राध्यापक की भूमिका को लेकर भी खूब चर्चा है। स्टाफ के कुछ सदस्यों का कहना है कि प्राचार्य तक पहुंचने वाली कई महत्वपूर्ण राय और सुझाव इसी प्राध्यापक के माध्यम से पहुंचते हैं।

यही वजह है कि कॉलेज में लिए जाने वाले कुछ निर्णयों को लेकर यह सवाल उठने लगा है कि फैसले वास्तव में व्यापक विचार-विमर्श के बाद लिए जा रहे हैं या फिर चुनिंदा सलाह के आधार पर। कुछ निर्णयों को लेकर स्टाफ और विद्यार्थियों की ओर से असहमति की बातें भी सामने आई हैं।

प्रशासनिक कोना में सवाल सिर्फ इतना है कि कॉलेज की व्यवस्था में सलाह महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय नियमों, पारदर्शिता और स्टाफ-विद्यार्थी हितों को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।

माननीय और बड़े साहब के बीच ‘कोने की चर्चाÓ के मायने!

पिछले दिनों अधिकारियों और अफसरों की एक बैठक के बाद वर्दी वाले बड़े साहब और एक माननीय के बीच कोने में हुई करीब पांच मिनट की बातचीत अब प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। खास बात यह रही कि बातचीत के दौरान मीडियाकर्मी भी आसपास मौजूद थे।

लिहाजा सामान्य दिखने वाली इस मुलाकात के मायने अब अपने-अपने हिसाब से निकाले जा रहे हैं। प्रत्यक्ष रूप से बातचीत में क्या हुआ, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि मौके पर मौजूद कुछ लोगों ने बॉडी लैंग्वेज और हाव-भाव के आधार पर अंदाजा लगाने की कोशिश की कि माननीय किसी मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करते नजर आ रहे थे।

बस फिर क्या था, पांच मिनट की यह चर्चा बैठक खत्म होने के बाद भी जारी रही। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल यही है कि आखिर ऐसा कौन सा विषय था, जिस पर माननीय को बड़े साहब के सामने स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत पड़ी? मामला क्या था, इसका जवाब तो दोनों ही बेहतर जानते होंगे, लेकिन कोने की पांच मिनट की चर्चा ने चर्चाओं का बाजार जरूर गर्म कर दिया है।

कुर्सी के कई दावेदार, बाजी युवा साहब के हाथ!

जिले की सबसे प्रमुख निकाय में सीएमओ का पद पुराने साहब के रिटायरमेंट के बाद से खाली पड़ा था। कुर्सी पर बैठने के लिए जिले के ही नहीं, बल्कि प्रदेश के बड़े शहरों में पदस्थ कई सीएमओ भी अपनी-अपनी तरफ से प्रयासरत बताए जा रहे थे। लंबे समय से चल रही इस कवायद के बीच आखिरकार जिले के ही एक युवा और मिलनसार माने जाने वाले निकाय सीएमओ को बड़ी जिम्मेदारी मिल गई।

क्षेत्रीय माननीय से उनकी नजदीकी को भी इस नियुक्ति से जोड़कर चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि नियुक्ति के वास्तविक आधार पर आधिकारिक तौर पर कुछ स्पष्ट नहीं है। अब साहब ने नई कुर्सी संभाल ली है तो असली परीक्षा भी शुरू हो गई है।

क्योंकि यह कुर्सी महज जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कांटों भरा ताज भी मानी जाती है। विकास कार्यों से लेकर ठेकों, निर्माण और प्रशासनिक फैसलों तक हर कदम पर नजरें रहेंगी। निकाय के गलियारों में अब चर्चा यही है कि साहब इस ‘काजल की कोठरीÓ से कितने बेदाग निकलते हैं, इसकी कहानी आने वाला वक्त लिखेगा।

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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