Betul Ki Khabar: वन भूमि अतिक्रमण में उलझन: कार्यवाही करो तो नेता नाराज, छोड़ो तो अधिकारी
Betul Ki Khabar: Confusion in forest land encroachment: Leaders are angry if action is taken, officers are angry if action is taken

दोहरे मापदंड के शिकार हो रहे वनकर्मी, निलंबन से कर्मचारियों में असंतोष
Betul Ki Khabar: बैतूल। वनभूमि पर अतिक्रमण को लेकर प्रदेश भर में वन विभाग के कर्मचारी असमंजस की स्थिति में हैं। हाल ही में सीहोर जिले में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा अतिक्रमणकारियों के समर्थन में हस्तक्षेप के बाद डीएफओ समेत कई अधिकारियों को कार्यवाही का सामना करना पड़ा। यह कार्यवाही उच्च अधिकारियों के आदेश पर ही की गई थी, बावजूद इसके कार्रवाई का खामियाजा निचले स्तर के अधिकारियों को भुगतना पड़ा। कुल मिलाकर इस कार्यवाही ने उन कर्मचारियों को असमंजस में डाल दिया है जो सुरक्षा के लिए घने जंगलों में तैनात किए गए हैं। कर्मचारी यह नहीं समझ पा रहे कि उन्हें किसका आदेश मानना है और किसके कोप का भाजन बनना है।
शाहपुर परिक्षेत्र के दो कर्मचारियों को मिली निलंबन की सजा
बैतूल वनवृत्त के उत्तर वनमंडल में भी इसी तरह की स्थिति सामने आई है। शाहपुर परिक्षेत्र की मेंढा खेड़ा बीते में पदस्थ एक वनपाल परसराम पाल और वनरक्षक पवन भलावी को को निलंबित कर दिया गया है। आरोप है कि दोनों ने वनभूमि पर हो रहे अतिक्रमण को रोकने में लापरवाही बरती। वन भूमि पर होने वाले प्रकरणों को ना ही रोकने के प्रयास किये गए औऱ ना ही कायमी की गई, लेकिन कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह कार्रवाई एकतरफा है और कर्मचारियों पर अनुचित दबाव बनाया जा रहा है। नाराज कर्मचारियों का कहना है कि वनभूमि पर काबिज अतिक्रमण पर कार्रवाई करें तो राजनीतिक हस्तक्षेप शुरू हो जाता है और न करें तो अधिकारी कार्यवाही कर देते हैं।
इस दोहरे दबाव में वन कर्मचारी पिस रहे हैं। वनकर्मी संगठनों ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि उन्हें स्पष्ट दिशा-निर्देश और संरक्षण मिलना चाहिए, ताकि वे कानून का पालन करते हुए बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के कार्य कर सकें। ऐसी परिस्थितियों में विभागीय कार्यप्रणाली और कर्मचारियों की मनोबल पर भी असर पड़ रहा है, क्योंकि अतिक्रमण का बड़ा दायर भैंसदेही परिक्षेत्र में बताया जा रहा है। यहां पलस्या औऱ लोकल दरी बीट बीट ऐसी हैं, जहां अतिक्रमण साफ देखा जा सकता है।
वह भूमि पर फसलों की बुवाई तक कर दी गई हैं। कार्यवाही करें तो लोकल नेताओं दबाव झेलना पड़ता है औऱ ना करें तो अधीकारियों द्वारा की जाने वाली निलंबन की कार्यवाही का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर समय रहते नीति स्पष्ट नहीं की गई तो कर्मचारियों में असंतोष और भी गहराता जाएगा।




