Politics: राजनीतिक हलचल: साफ छवि का नारा, बदनाम चेहरों का सहारा…. इनकी समाजसेवा या कोई और सेवा??? नेताजी की बेताबी या तस्वीर में आने की राजनीति???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

साफ छवि का नारा, बदनाम चेहरों का सहारा!
इन दिनों एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष को संगठन से ज्यादा ताकतवर चेहरों की तलाश है। चर्चा है कि उनकी नजर ऐसे लोगों पर है जिनकी पहचान सामाजिक कामों से नहीं, बल्कि आपराधिक मामलों से रही है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पार्टी के एक नगर अध्यक्ष ने अपने इलाके के एक चर्चित बदमाश की सीधे जिला अध्यक्ष से बात कराई और उसे फुल सपोर्ट का भरोसा भी मिल गया।
सियासी गलियारों में यह भी कानाफूसी है कि मामला सिर्फ बदनाम चेहरों को साथ जोड़ने तक सीमित नहीं है। विरोधियों पर हमला बोलने के लिए सोशल मीडिया की गंदगी और कुछ विवादित मीडिया चेहरों को भी एक मंच पर लाने की तैयारी चल रही है, ताकि राजनीतिक माहौल में जमकर जहर घोला जा सके।
अब यह चर्चा कितनी सच है और कितनी सियासी अफवाह, इसका फैसला समय करेगा, लेकिन सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या राजनीति में अब जनाधार से ज्यादा बाहुबल और बदनाम चेहरों की उपयोगिता बढ़ गई है? अगर ऐसा है, तो फिर स्वच्छ राजनीतिÓ के दावे सिर्फ भाषणों तक ही सीमित रह जाएंगे।
समाजसेवा या कोई और सेवा?
शहर में इन दिनों कुछ स्वयंभू सामाजिक संगठनों और उनके चर्चित चेहरों की गतिविधियां चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई हैं। जो चेहरे कभी समाजसेवा का दम भरते थे, अब उनकी कार्यशैली और रहन-सहन लोगों के लिए शोध का विषय बनते जा रहे हैं।
गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समाजसेवा के नाम पर चलने वाले इन चेहरों की आय का असली स्रोत क्या है? क्योंकि जीवनशैली ऐसी है कि बड़े-बड़े कारोबारी भी सोच में पड़ जाएं। चर्चा यह भी है कि प्रशासनिक हलकों में इनकी कई गतिविधियों को संदेह की नजर से देखा जाता है। कुछ लोग तो यहां तक कानाफूसी कर रहे हैं कि समाजसेवा की आड़ में ब्लैकमेलिंग, दबाव की राजनीति और ‘एडजस्टमेंटÓ का खेल भी खूब फल-फूल रहा है।
यही वजह है कि जहां पहले लोग इन्हें समाज का हितैषी मानते थे, वहीं अब इनके हर कदम और हर बयान के पीछे का मकसद तलाशने लगे हैं। कहते हैं, जनता सब देखती है और देर-सवेर हिसाब भी करती है, इसलिए अब समाजसेवा की दुकान चलाने वालों के लिए सिर्फ बड़े-बड़े दावे काफी नहीं होंगे। क्योंकि आज का आम आदमी चेहरे नहीं, चरित्र और कमाई के तरीके भी पढ़ना सीख गया है।
वापसी की बेताबी या तस्वीर में आने की राजनीति?
सियासत में कहते हैं कि दरवाजे कभी पूरी तरह बंद नहीं होते, बस सही वक्त और सही तस्वीर का इंतजार रहता है। ऐसा ही कुछ इन दिनों सत्तारूढ़ दल के एक पूर्व नेता को लेकर चर्चा में है। अपनी ही पार्टी के एक सक्रिय नेता की कथित आत्महत्या प्रकरण के बाद संगठन से बाहर का रास्ता दिखाए गए यह नेता अब वापसी की हर संभावना को भुनाने में जुटे बताए जा रहे हैं।
पिछले दिनों क्षेत्र के माननीय के जन्मदिन समारोह में भी उनकी सक्रियता कुछ ज्यादा ही देखने को मिली। मंच पर इस अंदाज में मौजूद रहे कि मानो संदेश साफ हो मैं यहीं हूं, बस आदेश का इंतजार है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मंच पर मौजूदगी केवल शुभकामना देने भर नहीं थी, बल्कि संगठन और नेतृत्व तक अपनी ‘हाजिरीÓ दर्ज कराने की कोशिश भी थी। अब इस तस्वीर के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
कोई इसे घर वापसी की तैयारी बता रहा है, तो कोई इसे राजनीतिक पुनर्वास की पटकथा का पहला दृश्य मान रहा है। फिलहाल संगठन की ओर से कोई संकेत नहीं है, लेकिन इतना तय है कि सियासत में तस्वीरें अक्सर शब्दों से ज्यादा बोलती हैं और मंच पर दिखाई देने वाला हर चेहरा सिर्फ दर्शक नहीं होता।
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