Betul Ki Khabar: 70 रुपए किलो का कांटा तार, वन विभाग में 125 रुपए की मंजूरी! फेंसिंग खरीदी में लाखों के खेल की आशंका

खुले बाजार से कहीं अधिक दरें स्वीकृत, टेंडर प्रक्रिया और निविदा शर्तों पर उठे सवाल; बजट जारी होते ही वित्तीय अनियमितता का आरोप
Betul Ki Khabar: बैतूल। बारिश के मौसम में वन क्षेत्रों में होने वाले वृक्षारोपण के बाद तार फेंसिंग के लिए कांटा तार खरीदी को लेकर वन विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पश्चिम वनमंडल के चिचोली और मोहदा परिक्षेत्र में कांटा तार खरीदी के लिए 125 रुपये प्रति किलो की दर स्वीकृत की गई है, जबकि दक्षिण वनमंडल के विभिन्न परिक्षेत्रों में यही सामग्री 75 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि यही कांटा तार खुले बाजार में करीब 70 रुपये प्रति किलो उपलब्ध बताया जा रहा है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पश्चिम वनमंडल में प्रस्तावित खरीदी का टेंडर इंदौर की किसी अमन इंटरप्राइजेस को दिए जाने की तैयारी है, जबकि दक्षिण वनमंडल में खंडवा की क्वालिटी इंटरप्राइजेस से खरीदी की जा रही है। बाजार मूल्य की तुलना में अधिक दरों पर स्वीकृति मिलने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
सूत्रों का दावा है कि पिछले वर्ष भी इसी प्रकार सामग्री खरीदी में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे थे। इस बार भी स्थानीय फर्मों को अवसर देने के बजाय बाहरी कंपनियों को प्राथमिकता दिए जाने से संदेह और गहरा गया है। आरोप है कि ऊंची दरों पर खरीदी कर सरकारी राशि का दुरुपयोग करने की फूल तैयारी की जा रही है।
निविदा शर्तों की उड़ रही धज्जियां,ऊंची कीमतों पर उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बाजार में वही कांटा तार लगभग 70 रुपये प्रति किलो उपलब्ध है, तो 75 और 125 रुपये प्रति किलो की दरें किस आधार पर स्वीकृत की गईं। यदि इन्हीं दरों पर बड़े पैमाने पर खरीदी होती है तो शासन को लाखों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ सकता है। सूत्रों का यह भी कहना है कि फिलहाल केवल दरों का अनुमोदन हुआ है और बजट स्वीकृत होने के बाद खरीदी प्रक्रिया शुरू होगी।
ऐसे में समय रहते पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई तो बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। पूरी टेंडर प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार निविदा की कई शर्तों का पालन नहीं किया गया है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि बाजार दरों से अधिक कीमत पर खरीदी की पुष्टि होती है तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा।
अब निगाहें वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और शासन पर हैं कि वे इस मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करते हैं या फिर बजट जारी होने के बाद करोड़ों रुपये की खरीदी बिना किसी जवाबदेही के आगे बढ़ा दी जाएगी। विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे इन सवालों का जवाब मिलना आवश्यक माना जा रहा है।
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