Betul Samachar: आदिम जाति विभाग में डबल चार्ज का खेल, चहेते अधीक्षकों पर मेहरबानी के आरोप

वर्षों से जमे अधीक्षक चला रहे व्यवस्था, आदिवासी क्षेत्रों में गैर आदिवासी अधीक्षकों को जिम्मेदारी देने पर उठे सवाल
Betul Samachar: बैतूल। आदिम जाति कार्य विभाग बैतूल एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। विभाग में अधीक्षकों की नियुक्ति, छात्रावासों के संचालन और डबल चार्ज व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। जागरूक लोगों का कहना है कि विभाग में वर्षों से जमे कुछ अधीक्षकों के भरोसे पूरा सहायक आयुक्त कार्यालय संचालित हो रहा है। चिचोली, भीमपुर, भैंसदेही और घोड़ाडोंगरी जैसे आदिवासी बाहुल्य विकासखंडों के अधीक्षक कार्यालयीन समय के बाद भी बैठकों में सक्रिय रहते हैं और विभागीय रणनीतियों में अहम भूमिका निभाते हैं।
सूत्रों के अनुसार छात्रावासों में पदस्थापना और खाली सीटों पर नियुक्तियों में भी इन्हीं अधीक्षकों का प्रभाव रहता है। आरोप यह भी हैं कि जो ज्यादा बोली लगाता है, उसे बेहतर और मलाईदार छात्रावास की जिम्मेदारी मिल जाती है। विभाग में अतिरिक्त जिम्मेदारी निभाने वाले कुछ अधीक्षकों को दो-दो छात्रावासों का प्रभार देकर पुरस्कृत किए जाने की चर्चा भी जोरों पर है।

कई विकासखंडों में अधीक्षकों को मिला डबल चार्ज
विकासखंड बैतूल में पवन कुमार फाटे को आदिवासी महाविद्यालयीन बालक छात्रावास तथा सीनियर बालक छात्रावास बैतूल दोनों की जिम्मेदारी दी गई है। इसी तरह चिचोली में सचिन राय के पास अंग्रेजी माध्यम माध्यमिक बालक आश्रमशाला और विकासखंड स्तरीय सीनियर उत्कृष्ट छात्रावास का प्रभार है। घोड़ाडोंगरी में मदन यादव कुही और बंजारीवाल के जूनियर बालक छात्रावास संचालित कर रहे हैं।
पति-पत्नी की जोड़ियों पर भी विभाग मेहरबान
घोड़ाडोंगरी में मदन यादव के साथ उनकी पत्नी आशा यादव को भी आदिवासी कन्या आश्रम शाला सलैया का प्रभार सौंपा गया है। इस तरह एक ही परिवार के जिम्मे तीन छात्रावास हैं। इसी प्रकार बैतूल में कमलेश राक्से सीनियर अजा बालक छात्रावास संभाल रहे हैं, जबकि उनकी पत्नी ललिता राक्से आदिवासी कन्या शिक्षा परिसर की जिम्मेदारी निभा रही हैं। फाटे दंपत्ति पर भी विभागीय मेहरबानी के आरोप लग रहे हैं। पवन फाटे जहां दो छात्रावासों के अधीक्षक हैं, वहीं उनकी पत्नी प्रीति फाटे करीब 12 वर्षों से नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या छात्रावास में अधीक्षिका पद पर पदस्थ हैं।
गैर आदिवासी अधीक्षकों को प्राथमिकता पर सवाल
आरोप यह भी हैं कि आदिवासी छात्रावासों में आदिवासी वर्ग के कर्मचारियों को प्राथमिकता दिए जाने के बजाय गैर आदिवासी अधीक्षकों को मुख्यालय और महत्वपूर्ण छात्रावासों की जिम्मेदारी दी जा रही है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि यही अधीक्षक सहायक आयुक्त के करीबी माने जाते हैं और अधिकांश फैसलों में प्रभाव रखते हैं। शिक्षक कमी का हवाला देकर की गई व्यवस्थाओं और दूरस्थ क्षेत्रों से शिक्षकों को अधीक्षक बनाए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं। पूरे मामले ने आदिम जाति कार्य विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। इस मामले में चर्चा करने के लिए सहायक आयुक्त को काल किया, लेकिन हमेशा की तरह उनका नंबर ब्लाक होने से चर्चा नहीं हो पा रही है।
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