Betul News: चांदी के दामों में ऐतिहासिक उछाल, आदिवासी अंचलों की परंपराओं पर मंडराया संकट

गहने खरीदना अब गरीबों के लिए हुआ दूर की कौड़ी
Betul News: बैतूल। चांदी की कीमतों में इन दिनों ऐतिहासिक उछाल देखने को मिल रहा है। बाजार में चांदी के दाम ढाई लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। इस बेतहाशा महंगाई का सीधा असर आदिवासी अंचलों की सांस्कृतिक परंपराओं, लोक उत्सवों और वैवाहिक आयोजनों पर पड़ता नजर आ रहा है। वर्षों से चली आ रही आदिवासी समाज की चांदी के आभूषण पहनने की परंपरा अब आर्थिक दबाव के कारण संकट में दिखाई दे रही है।
आदिवासी संस्कृति में चांदी के आभूषण केवल सजावट का माध्यम नहीं रहे हैं, बल्कि यह सामाजिक पहचान, आर्थिक स्थिति और आध्यात्मिक विश्वासों का प्रतीक भी माने जाते रहे हैं। आदिवासी महिलाएं पारंपरिक रूप से पायल, पौड़ी, करदोना, अंगूठी, कंठी सहित विभिन्न प्रकार के चांदी के आभूषण पहनती आई हैं। ये आभूषण उनके जीवन, संस्कारों और उत्सवों से गहराई से जुड़े हुए हैं। शादी-विवाह, त्योहार और सामाजिक आयोजनों में चांदी के गहनों का विशेष महत्व रहा है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों से चांदी के दामों में लगातार वृद्धि होती जा रही है, लेकिन हालिया बढ़ोतरी ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। अब आदिवासी समुदाय के सामने चांदी के गहने खरीदना आसान नहीं रह गया है। सीमित आय और बढ़ती महंगाई के बीच आदिवासियों के पास इतना बजट नहीं बचता कि वे अपनी परंपराओं के अनुरूप आभूषण खरीद सकें। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई परिवार या तो कम गहने पहनने लगे हैं या फिर पूरी तरह से इन्हें छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
इस महंगाई का असर केवल श्रृंगार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और आर्थिक पहलू भी है। आदिवासी समाज में चांदी के गहनों को एक तरह का इमरजेंसी फंड भी माना जाता रहा है। किसी बीमारी, पारिवारिक संकट या अन्य जरूरी जरूरत के समय इन गहनों को बेचकर या गिरवी रखकर नगदी का इंतजाम किया जाता था। यह परंपरा आदिवासी परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक अहम जरिया थी।
लेकिन चांदी के दाम बढ़ने और आमदनी के सीमित रहने से अब यह व्यवस्था भी कमजोर पड़ती जा रही है। आज की स्थिति में अधिकांश आदिवासी परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर होते जा रहे हैं। आय के सीमित साधनों और महंगाई के दबाव के कारण उनकी पारंपरिक बचत प्रणाली समाप्त होने के कगार पर है। इसका सीधा असर आदिवासी महिलाओं के श्रृंगार पर भी दिखाई दे रहा है।
गांवों में अब पहले की तरह चांदी की पायल, पौड़ी और अन्य आभूषण पहने महिलाएं कम नजर आने लगी हैं। कुल मिलाकर चांदी के बढ़ते दाम आदिवासी समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के लिए एक बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में आदिवासी संस्कृति से जुड़े कई पारंपरिक आभूषण और रिवाज धीरे-धीरे केवल यादों तक सीमित होकर रह जाएंगे।
क्या कहती है आदिवासी महिलाएं
आदिवासियों महिलाओं में चांदी के गहने पहनने की सदियों पुरानी संस्कृति और परम्पराओं का विभिन्न हिस्सा है। यह आभूषण आदिवासियों की पहचान भी है। यह सहीं बात है कि चांदी की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो गई है। अब गहने खरीदना आदिवासियों के वश की बता नहीं रही। गरीब आदिवासी जैसे-तैसे महीने मेहनत-मजदूरी कर पेट पाल रहे है। आभूषण खरीदकर पहनना अब किसी के वश की बात नहीं है। महंगाई के कारण अब आदिवासियों की परम्परा सिमटते जा रही है।
चेतना सरियाम बैतूल




