Betul Samachar : वन विभाग में करोड़ों के कथित फर्जीवाड़े पर फिर बढ़ी सरगर्मी
Betul News: There is again increased excitement over the alleged fraud of crores in the Forest Department.

‘ओके रिपोर्ट’ ने खड़े किए कई सवाल, कोष एवं लेखा विभाग की आपत्ति सही या जांच प्रतिवेदन संदिग्ध?
Betul Samachar : बैतूल। पश्चिम वन मंडल में कथित 2 करोड़ 13 लाख 95 हजार 213 के फर्जीवाड़े का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक जांच में वित्तीय लेन-देन पर संदेह व्यक्त किए जाने के बाद 25 अगस्त को कार्यालय आयुक्त, कोष एवं लेखा विभाग ने औपचारिक रूप से जांच के निर्देश जारी किए थे। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच प्रतिवेदन शासन को भेज भी दिया गया है, किन्तु आश्चर्य यह कि रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी प्रकार का भी फर्जीवाड़ा नहीं पाया गया। इसी निष्कर्ष ने पूरे मामले को और उलझा दिया है तथा कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
662 संदिग्ध भुगतानों का उल्लेख, फिर फर्जीवाड़ा कैसे नहीं?
सूत्र बताते हैं कि आयुक्त द्वारा जारी मूल पत्र में 662 भुगतानों को संदिग्ध बताते हुए ही जांच का आदेश दिया गया था। सामान्यत: वित्तीय अनियमितताओं पर उच्च स्तरीय ऑडिट तभी हस्तक्षेप करता है, जब आंकड़ों में विसंगतियां स्पष्ट दिखाई दें। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जब प्रारंभिक स्तर पर इतना गंभीर संदेह था, तो अंतिम रिपोर्ट में अचानक सब कुछ ‘ओकेÓ पाए जाने की वजह क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार, जांच का आधार ही संदेहजनक भुगतानों से शुरू हुआ था, जिसके बाद ‘संपूर्ण रूप से शुद्धÓ रिपोर्ट मिलना कई मायनों में विरोधाभासी प्रतीत होता है।
जांच अधिकार क्षेत्र पर भी उठे सवाल
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जांच की प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। वन विभाग से संबंधित प्रशासनिक एवं वित्तीय अनियमितताओं की जांच प्राय: विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों जैसे डीएफओ, सीसीएफ, या अन्य प्राधिकृत अधिकारियों के स्तर पर की जाती है। लेकिन इस प्रकरण में जांच का भार कलेक्टर को सौंपा गया, जबकि विषय पूरी तरह विभागीय और तकनीकी प्रकृति का था। विश्लेषकों का मानना है कि विभाग से बाहर की जांच में कई महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदु छूट सकते हैं, जिनकी समझ विभागीय विशेषज्ञों को ही होती है।
जांच में देरी ने बढ़ाया शक,क्या रिकॉर्ड संतुलित किया?
तीसरा बड़ा सवाल जांच प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर है। आदेश अगस्त 2025 की शुरुआत में जारी हुए थे, परंतु जांच प्रतिवेदन जमा होने में लंबा समय लग गया। सूत्रों का दावा है कि इस विलंब ने संबंधित अधिकारियों को रिकॉर्ड में सुधार या प्रकरण को नया रूप देने का अवसर प्रदान किया। सूत्र यहां तक कहते हैं कि कई दस्तावेजों, भुगतान प्रविष्टियों और व्यय विवरणों में विसंगतियां स्पष्ट रूप से दर्ज थीं, लेकिन अंतिम रिपोर्ट में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। यदि वास्तव में वित्तीय गड़बड़ी हुई है और उसे छिपाने का प्रयास किया गया है, तो यह धोखाधड़ी, वित्तीय अपराध और सरकारी धन के दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा।
अब फैसला शासन के हाथों में
फिलहाल मामला शासन स्तर पर विचाराधीन है। अब देखना यह है कि क्या कोष एवं लेखा विभाग की प्रारंभिक आपत्तियां सही थीं? या फिर जांच प्रतिवेदन में गंभीर चूक हुई है? सच्चाई तभी सामने आएगी जब या तो पुन: जांच कराई जाए या प्रतिवेदन को सार्वजनिक किया जाए। फिलहाल पूरे पश्चिम वन वृत में इस विषय पर चर्चाओं का दौर तेज है और कर्मचारी-अधिकारियों में भी चिंता का माहौल है।




