Prashasnik Kona : प्रशासनिक कोना: इनकी पदस्थापना के जश्न में बेचारे ढाबा संचालक की उधारी कौन चुकाएगा?? दिल्ली गए साहब, पीछे रह गया वेतन, किस असिस्टेंट का सूट बन गया चर्चा का विषय??? दस साल से जेब मे पला- बढ़ ‘ दूध देने वाला’ वारंट… आखिर माजरा क्या है???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में……

पदस्थापना का जश्न और बेचारा ढाबा संचालक

शहर की पुलिसिंग में कभी-कभी ऐसा मसाला पक जाता है कि चटखारे खुद-ब-खुद उठने लगते हैं। ताज़ा किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। हुआ यूं कि एक छोटे से थाने के साहब जब बड़े थाने में पदस्थ हो गए, तो जश्न का तापमान मौसम से भी ज्यादा चढ़ गया। साहब और उनके चेले-चपाटों का जोश इतना बुलंद हो गया कि सीधे बैतूल-छिंदवाड़ा फोरलेन वाले एक ढाबे पर पार्टी जम गई और खूब जमकर! लेकिन असली स्वाद तो जश्न में नहीं, जश्न के बाद पकने वाली कहानी में है।/कहते हैं कि साहब की नई कमान किसी मजबूरी में सौपी गई थी। छोटे प्रकरण में बड़े साहब को लूप लाइन में डाला गया, और उसी जुगाड़ में इस नए थानेदार को सीधे ए-ग्रेड की कुर्सी मिल गई। अब इतना बड़ा प्रमोशन मिले तो चूहे को चिंधी मिलना लाजमी है… और साहब ने यही कहावत खूब निभाई।

दिल्ली गए साहब, पीछे रह गया वेतन, असिस्टेंट का सूट बना चर्चा का विषय

विभाग में पिछले 5 महीने से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला, मगर इससे बेफिक्र साहब और उनके असिस्टेंट दिल्ली दौरे की चमक-दमक में इस कदर खोए रहे कि दफ्तर में चर्चा का नया मसाला पक गया। राजधानी में सम्मान लेने बुलाए गए बड़े साहब अपने असिस्टेंट को साथ ले गए तो असिस्टेंट ने भी मौका देखकर बिल्कुल साहब जैसा झन्नाटेदार कोट-पैंट का सूट सिलवा मारा, वही कट, वही फिट और वही रौब। किसी आम कर्मचारी ने यह हरकत की होती तो पता नहीं कितनी फाइलें उलटी-पलटी जातीं, लेकिन साहब के खास होने का फायदा यह कि असिस्टेंट ने सूट सिलवाने की टाइमिंग भी ऐसी चुनी जब विभाग की उनकी शाखा का कोई भी कर्मचारी 5 माह से वेतन का मुंह नहीं देख पाया है।

मज़दूरी से जुड़ी इस स्कीम में पदस्थ यह असिस्टेंट पड़ोसी जिले से छह साल पहले यहां तबादला होकर आए थे, और तब से इनकी पहचान कुछ खास ही रही है। स्कीम से जुड़ा डेटा मांगो तो चेहरा ऐसा बनता है मानो किसी ने किडनी मांगी हो। इधर, इनके साहब का रुतबा भी कम नहीं। उन्हें लगता है कि किसी भी जानकारी का खुलासा हो गया तो सीधे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। मगर राजधानी में मिले सम्मान का ढोल पीटने में वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं, दफ्तर में गाहे-बगाहे टोड़िंगे हांकने का क्रम फिलहाल जोर-शोर से चल रहा है।दिल्ली की चमकती रोशनी में सूट तो टंग गया, पर दफ्तर के वेतन की फाइलें कब चलेंगी? यह कोई बताने वाला नहीं। कर्मचारियों की जेबें खाली हैं, मगर साहब और असिस्टेंट की शान में कोई कमी नहीं। कॉलम में चर्चा गर्म है…और दफ्तर में सवाल भी।

दस साल से जेब में पला-बढ़ा ‘दूध देने वाला वारंट

आमला में पदस्थ एक पुलिसकर्मी इन दिनों खासा चर्चा में है। कारण कोई वीरता या उपलब्धि नहीं, बल्कि एक ऐसा गैर-जमानती वारंट, जो पिछले दस सालों से उसके लिए दूध देने वाली गाय बना हुआ है। यह वही केस है, जब कोतवाली और गंज एक ही थाना थे और एक चेक बाउंस के मामले में यह वारंट जारी हुआ था। वारंट निकला, आरोपी सामने था, कागज पर सब कुछ ठीक था… पर तामील? नहीं साहब, वह तो जैसे किसी और ग्रह का काम था। कहते हैं कि तब से लेकर आज तक, यानी पूरे दस साल में थाने बदले, अधिकारी बदले, जिले का नक्शा बदला, पर एक चीज़ नहीं बदली: इस पुलिसकर्मी और आरोपी की हर महीने होने वाली ‘अनौपचारिक मीटिंग।

सरकारी कागज़ में आरोपी फरार, पर हकीकत में पूरी तरह उपलब्ध!इतना उपलब्ध कि महीने में एक बार तो मिलना तय—क्योंकि वारंट से दूध जो निकालना है! वारंट जारी हुआ था बैतूल में, आरोपी चला गया होशंगाबाद… लेकिन वारंट का दूध निकालने का सिस्टम ऐसा सेट हो गया कि लोकेशन बदलने से भी काम प्रभावित नहीं हुआ। दस साल से यह वारंट पुलिसकर्मी की जेब में सुरक्षित घूमता रहा, मानो कोई पर्सनल स्नष्ठ हो, जिसे समय-समय पर ब्याज सहित भुनाया जा रहा हो। कानून कहता है—वारंट तामील होना चाहिए, पर सिस्टम कहता है कि वारंट तो चलता-फिरता एटीएम भी हो सकता है, अगर जेब सही हो। पब्लिक तो बस तमाशा देख रही है कि आखिर यह वारंट तामील होगा भी या नहीं, या आगे भी ऐसे ही ‘गायÓ की तरह दूध देता रहेगा।

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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