Betul News: जिला अस्पताल में आप लिखे, खुदा बांचे के हालात
Betul News: District hospital becomes a hub where you can write 'Khuda Bachche'

डॉक्टर की लिखावट ने उड़ाए होश! सिविल सर्जन तक नहीं पढ़ पाए सरकारी डॉक्टर की लिखी दवाइयां
Betul News: बैतूल। जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब इलाज से ज्यादा दिक्कत डॉक्टरों की लिखावट पढ़ने में आने लगी है। हाल ही में सामने आए एक मामले ने पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल एक महिला मरीज का उपचार कर डॉक्टर ने उसे दवाई की पर्ची थमाई, लेकिन उसकी लिखावट ऐसी थी कि मरीज के परिजन अस्पताल से लेकर शहर के कई मेडिकल स्टोर्स तक भटकते रही पर कोई भी उस पर्ची में लिखी दवाओं के नाम समझ नहीं पाए। लिखावट देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस किसी भी डॉक्टर ने मरीज को यह दवाइयां लिखी है वो मोटा वेतन लेने के बाद भी अपने फर्ज के प्रति किस लापरवाही के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है।
आखिरकार जब मामला सिविल सर्जन के पास पहुंचा, तो उन्होंने भी हार मान ली। सिविल सर्जन ने स्वयं स्वीकार किया कि लिखावट इतनी अस्पष्ट है कि इसे कोई भी पढ़ नहीं सकता। यह घटना न केवल डॉक्टर की गैर-जिम्मेदारी को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि जिला अस्पताल किस हाल में चल रहा है।
मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है डॉक्टर की लापरवाही
दरअसल पूरा घटनाक्रम 28 अक्टूबर के बताया जा रहा है। ग्राम बारहवीं की महिला मरीज रेखा को तबियत खराब होने के बाद परिजन सरकारी अस्पताल लेकर आये थे। पर्ची बनने के बाद जब डॉक्टर को दिखाया गया तो डॉक्टर ने दवाइयां लिख दी। परिजनों का कहना है कि जिस लिखावट में दवाइयां लिखी गई थी, उस लिखावट को अस्प्ताल के मेडिकल स्टोर कर्मचारी भी नहीं समझ पाए अस्पताल के बाहर स्तिथ मेडिकल स्टोर संचालक भी इसे देख हैरान रह गए, और दवाइयां नहीं मिल पाई। दोबारा अस्पताल पहुंचे, लेकिन उक्त डॉक्टर भी जा चुके थे। मजबूरी में निजी अस्पताल में मरीज को दिखाकर दवाइयां लेना पड़ा। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों को यह समझना चाहिए कि उनकी एक अस्पष्ट लिखावट मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है। कई बार गलत दवा मिलने से स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे में साफ-सुथरी लिखावट या कंप्यूटराइज्ड पर्ची अनिवार्य की जानी चाहिए।
टाइम पास का जरिया बना अस्पताल, निजी प्रैक्टिस पर ज्यादा फोकस
मामला सामने आने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि जिला अस्पताल पूरी तरह आप लिखें खुदा बांचे की तर्ज पर चल रहा है , यानी सब कुछ भगवान भरोसे। न कोई व्यवस्था, न कोई जवाबदेही। डॉक्टरों से लेकर प्रबंधन तक सभी अपने दायित्वों से मुंह मोड़े बैठे हैं। बताया जा रहा है कि जिला अस्पताल में सरकार से मोटा वेतन पाने वाले कई डॉक्टर ड्यूटी टाइम पर जैसे तैसे केवल टाइम पास कर रहे हैं। पर्ची पर लिखी अस्पस्ट लिखावट इसी का एक उदाहरण है। कई डॉक्टर हैं जिनका पूरा $फोकस गरीब कमजोर वर्गों फ्री इलाज के बजाय मोटी फीस लेकर इलाज देने के लिए की जा रही निजी प्रैक्टिस पर ज्यादा है।जबकि नियमानुसार कोई भी सरकारी डॉक्टर निजी क्लिनिक नहीं चला सकता है।
सिविल सर्जन तक नहीं पढ़ पाए डॉक्टर ने लिखी कौनसी दवाई
स्वास्थ्य विभाग की यह लापरवाही किसी भी सम्भावित आपदा से कम नहीं है। जब सिविल सर्जन तक डॉक्टर की लिखावट न समझ सकें, तो यह स्वास्थ्य तंत्र की सबसे बड़ी विफलता कही जाएगी। जब सिविल सर्जन डॉ जगदीश घोरे के वाट्स एप पर पर्ची भेज कर पूछा गया कि कौनसी दवाइयां लिखी हैं, तो उनका जवाब था कि क्या लिखा है कुछ समझ मे नहीं आ रहा है। इन हालातों में अब ज़रूरत है कि जिला प्रशासन डॉक्टरों को सख्त निर्देश दे और ऐसी लापरवाही पर कार्यवाही सुनिश्चित करे, ताकि मरीजों की जान बचाने वाला अस्पताल किसी दिन मज़ाक का केंद्र न बन जाए।
इनका कहना….
पर्ची पर कौनसी दवाइयां लिखी है यह समझ मे नहीं आ रहा, पता करेंगे कि किस डॉक्टर ने यह दवाइयां लिखी हैं। समझाइशें दी जाएगी।
जगदीश घोरे, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल बैतूल




