Betul News: न व्याकरण सही न शब्दावली, विभागों में हिंदी की दुर्दशा
Betul News: Neither grammar nor vocabulary is correct, Hindi is in a bad state in departments

हिंदी दिवस पर मुंह चिढ़ा रहे सड़कों के नाम, दीवार लेखन से लेकर रेलवे के कामकाज तक हर तरफ बुरे हाल
Betul News: बैतूल। रविवार को विश्व में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। संयोग वश हिंदी को हमारी राज्य भाषा का भी दर्जा प्राप्त है और इसे पूरे 76 वर्ष बीत गए हैं। बावजूद इसके आम लोकाचार से लेकर सरकारी महकमों तक हिंदी की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हर वर्ष 14 सितंबर को जयंती मनाने की औपचारिकता भर निभाई जा रही है, लेकिन हिंदी के संरक्षण और संवर्धन पर न तो कोई ठोस प्रयास किए जा रहे हैं और न ही इसके जानकार विद्दवानों को महत्व मिल रहा है, जिसके वे हकदार है।
वर्तमान में हिंदी को लेकर जो भी हो रहा है। उसकी दिशा विपरित कही जा सकती है। नियम के अनुसार राजभाषा का महत्व ही है कि सरकारी कामकाज भाषा, लेकिन सरकारी विभागों में ही मातृ भाषा की घोर दुर्दशा हो रही है। इस तरह के हालात बदलने के सार्थक प्रयास नहीं हो पा रहे हैं। यही वजह है कि बैतूल जिले में भी दर्जनों दफ्तरों में राजभाषा हिंदी के चलन पर कई तरह के सवाल खड़े हो गए। यह बात दावे से इसलिए कही जा रही है कि सरकारी विभागों में पत्रचार तो हिंदी में हो रहे हैं, लेकिन इनकी भाषाशैली और मात्राओं पर किसी ने ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी।
यही वजह है कि शासकीय पत्राचारों में हिंदी भाषा की दुर्दशा देखने लायक हो रही है। कहीं मात्राओं में इतनी गलतियां हो रही हैं कि इसे देखने और समझने वाले खुद आश्चर्य चकित हो जा रहे हैं, लेकिन सरकारी नुमाइंदे इसे महज एक औपचारिकता मानकर बैठे हैं। यही वजह है कि हमारी राज्यभाषा सरकारी कार्यालयों में ही त्रुटियों के कारण चर्चा में रहती है।

केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालय औपचारिक
हिंदी भाषा को लेकर केंद्र और राज्य सरकार से जुड़े अधिकांश शासकीय दफ्तर और इससे जुड़े विभागों में दुर्दशा का शिकार हो रही है। बैतूल जिले की बात करें तो 10 तहसीलों में ऐसा कोई विभाग नहीं होगा, राजभाषा का सम्मान करते हुए गलती न की जाए। यही हाल केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में हो रहे हैं। इससे हिंदी की वास्तविकता को पता चलती है। बताते चले कि 14 सितंबर 1949 को हमारी राज्य भाषा को भारत की संविधान सेवा ने राज्य भाषा के रूप में स्वीकार किया है। इसकी लिपी देवनगरी मान्य की। जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तब से हिंदी को अनुच्छेद 343(1) का दर्जा प्रभावी है, यह सरकारी कामकाज की भाषा है,लेकिन सरकारी विभागों में ऐसी भाषा देखने को नहीं मिल रही।

यह उदाहरण हिंदी की दुर्दशा के लिए काफी है
हिंदी दिवस पर सांझवीर टाईम्स ने अल्प समय में सरकारी विभागों में दुर्दशा को सामने लाने का प्रयास किया है। इसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि केंद्र और राज्य के अफसर राज्य भाषा को लेकर किस तरह से अपना कर्तव्य निभा हरे हैं। बैतूल से इंदौर और नागपुर फोरलेन पर एनएचएआई सड़क किनारे गांवों के नामों और अन्य सूचना फलक लगाए। इनमें इतनी गलतियां है कि हिंदी को जानने वाले इसे राजभाषा का अपमान बताते हैं।
बैतूल से इंदौर मार्ग पर खेड़ीसांवलीगढ़ का सूचना फलक मात्रा की गलतियों के कारण मुंह चिढ़ा रहा है। यह हालात कई सूचना फलक पर देखे जा रहे हैं। इसी तरह बैतूल-नागपुर फोरलेन पर कई गांवों के नाम मात्राओं के कारण बदल गए हैं।
सरकारी दफ्तरों की बात करें तो बैतूल समेत आमला, सारणी, मुलताई में लगने वाले केंद्र और राज्य सरकार के सूचना फलकों में गलतियों की भरमार है। आमला रेलवे में नर्मदा लोको पायलट तथा गार्ड रनिंग रूम में मात्रा की गलती हो या मुलताई का तहसील कार्यालय का बोर्ड। यह हिंदी की दुर्दशा को बताने के लिए काफी है। यह तो महज उदाहरण है, अधिकांश सरकारी दफ्तरों में हिंदी भाषा का अपमान हो रहा है।




