Betul Ki Khabar: कंडम बिल्डिंग का मेकअप, इंजीनियरिंग की लापरवाही और तंत्र का नमूना

Betul Ki Khabar: Makeup of a condemned building, an example of engineering negligence and system

बड़ी पुलिस लाइन में मरम्मत के नाम पर लाखों की बर्बादी सवालों के घेरे में, नए एसपी के संज्ञान में आया मामला

Betul Ki Khabar: बैतूल। बड़ी पुलिस लाइन के पुराने क्वार्टर इन दिनों मरम्मत के नाम पर हो रहे खर्च को लेकर सवालों के घेरे में हैं। पुलिस हाउसिंग बोर्ड द्वारा इन जर्जर क्वार्टरों के मेकअप पर करीब 77 लाख रुपए फूंके जा रहे हैं। जबकि पीडब्ल्यूडी विभाग पूर्व में इसका निरीक्षण कर चुका है। यह अलग बात है कि इसे कंडम घोषित नहीं किया जा सका, लेकिन निरीक्षण में ये बिल्डिंगे कंडम से कम भी नहीं आंकी गई थीं, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने इन्हें तोड़कर नए बनाने की बजाय केवल पेंट-पुट्टी और टाइल्स लगवाकर ‘मेकअपÓ कराने का रास्ता चुना है।

जिस तरह से भविष्य की आपदा झेलने को मजबूर पुलिसकर्मियों के परिवारों की जान जोखिम में डाले जाने के प्रयास किये जा रहे हैं। उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इंजीनियरिंग की लापरवाही और तंत्र की मिलीभगत से अच्छी खासी राशि को चूना लगाया जा रहा है। हालांकि इस मामले को नवागत एसपी वीरेंद्र जैन ने संज्ञान में लिया है।

सौंदर्यीकरण का ठेका निकालकर बजट खर्च करने का तरीका

पुलिस लाइन के 40 साल पुराने इन आवासों में दरारें, सीलन, झरता प्लास्टर और कमजोर हो चुकी छतें आसानी से देखी जा सकती हैं। इन सबके बावजूद इंजीनियरिंग विंग ने केवल सौंदर्यीकरण का ठेका निकालकर बजट खर्च करने का तरीका अपना लिया है। नतीजा यह कि भवन बाहर से चमचमाते नजर आते हैं, लेकिन अंदर का ढांचा कमजोर और असुरक्षित ही माना जाएगा, क्योंकि किसी भी भवन की मजबूती के आधार ही उसकी नींव और ऊपरी सतह पर टिकी होती है। दावा किया जा रहा है कि बिल्डिंगों की ऊपरी छतों को तोड़कर नई छत बनवाई जाएगी। अब किस आधार पर यह दावे किए जा रहे हैं यह किसी के भी समझ से परे है।

लोक निर्माण विभाग पहले ही कर चुका निरीक्षण

कुल मिलाकर यह पूरा खर्च महज दिखावा ही साबित हो रहा है। सिविल इंजीनियरिंग से जुड़े जानकारों का मानना है कि, जब इमारतें रहने लायक ही नहीं बचीं, तो लाखों की मरम्मत का कोई औचित्य नहीं। सड़े हुए लोहे और कमजोर छत के प्लास्टर से टपकती छत और टूटी दीवारों पर रंगरोगन करवा देने से न तो सुरक्षा बढ़ेगी और न रहने की सुविधा सुधरेगी, कायदे से इन कंडम क्वार्टरों को ध्वस्त कर नए आवास बनाने चाहिए थे।

इससे कर्मचारियों को सुरक्षित और टिकाऊ सुविधा मिलती और सरकारी धन का सही उपयोग भी होता, लेकिन मरम्मत के नाम पर चल रही यह कवायद का कोई सकारात्मक परिणाम भविष्य में देखने को नहीं मिलेगा। यह साफ-साफ जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी है। सोचने और समझने वाली बात है कि, जब भवन की नींव ही कमजोर है, तो यह मेकअप कितने दिन चलेगा? जिम्मेदारों को इस दिशा में गंभीरता दिखाकर पुराने ढांचों को हटाकर नए क्वार्टरों का निर्माण कराना चाहिए।

कुल मिलाकर, बड़ी पुलिस लाइन का यह मामला इंजीनियरिंग की लापरवाही और तंत्र की मिलीभगत का आईना दिखा रहा है। लाखों की राशि खर्च होने के बाद भी न तो पुलिसकर्मियों को बेहतर आवास मिल पाएंगे और न ही आम जनता के टेक्स के रूप में सरकार को दी जाने वाली राशि का सही सदुपयोग हो पाएगा। इसमामले को लेकर पुलिस हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी दुर्गेश वाईकर से उनका पक्ष जानने के लिए मोबाइल नम्बर 9074143570 पर लगातार सम्पर्क किया गया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

इनका कहना….

मेरे संज्ञान में यह मामला आया है, अधिकारियों से इस संबंध में जानकारी लेकर कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

वीरेंद्र जैन, एसपी बैतूल

बिल्डिंगों की मरम्मत पुलिस हाउसिंग बोर्ड द्वारा 77 लाख की लागत से कराई जा रही है। जिन बिल्डिंगों की ऊपरी छत कमजोर है, उसकी जगह नई छत डाली जाएगी।

दिनेश मर्सकोले, आरआई बैतूल पुलिस

Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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