Betul News: 35 से 45 की उम्र वाला जिला अध्यक्ष आएगा कांग्रेसियों को रास?
Betul News: Will Congressmen like a district president between the ages of 35 and 45?

कांग्रेस संगठन सर्जन अभियान को लेकर वरिष्ठों में असंतोष, बढ़ सकती है गुटबाजी
Betul News: बैतूल (सत्येंद्र सिंह परिहार) । नींद की झपकी में डूबी कांग्रेस को जगाने और संगठन में नई ऊर्जा भरने के इरादे से कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में भोपाल से कांग्रेस संगठन सर्जन अभियान की शुरुआत की गई थी। लेकिन इस अभियान के शुरुआती कदम ही कांग्रेस के भीतर खलबली मचाने लगे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए संगठनात्मक दिशा-निर्देशों के मुताबिक अब जिला कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए उम्र सीमा 35 से 45 वर्ष तय की गई है। यानी यह जिम्मेदारी अब केवल उसी युवा नेता को मिलेगी, जिसकी उम्र इस दायरे में है और जिसने कम से कम पांच वर्षों तक सक्रिय राजनीति की हो।
हालांकि यह बदलाव पार्टी को नई दिशा देने के उद्देश्य से किया गया है, लेकिन इससे कांग्रेस के भीतर असंतोष और गुटबाजी की संभावनाएं बढ़ गई हैं। वरिष्ठ कांग्रेसियों ने भले ही सार्वजनिक रूप से इस बदलाव का विरोध न किया हो, लेकिन बंद कमरों में नाराजगी साफ झलकने लगी है। पार्टी में दशकों से समर्पित भाव से काम कर रहे नेता मानते हैं कि अनुभव को दरकिनार कर यदि मात्र उम्र के आधार पर जिला अध्यक्ष का चयन किया गया तो संगठन की नींव कमजोर हो सकती है।
सीनियर को जूनियर की चाकरी मंजूर नहीं!
जिले के कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उम्र सीमा तय करने से पार्टी में अनुभव और संगठनात्मक समझ रखने वाले नेताओं की भूमिका सीमित हो जाएगी। नई उम्र के नेताओं को जिला अध्यक्ष बना देने से संगठन की कमान अनुभवहीन हाथों में चली जाएगी। वरिष्ठ नेताओं को यह भी आशंका है कि उन्हें उन नेताओं के अधीन काम करना पड़ेगा, जिन्हें उन्होंने स्वयं राजनीति में मार्गदर्शन दिया है। ऐसे में संगठनात्मक समन्वय बनाए रखना बेहद कठिन होगा। इससे कांग्रेस के भीतर अंतर्विरोध और खींचतान की स्थिति उत्पन्न होना तय मानी जा रही है।
जिले में पहले से ही गुटबाजी चरम पर
बैतूल जिले की कांग्रेसी राजनीति में पहले से ही विभिन्न गुटों का बोलबाला है। सुखदेव पांसे, हेमन्त वागद्रे, निलय डागा, अरुण गोठी, समीर खान, डॉ. राजेन्द्र देशमुख, राजेश गावंडे, नवनीत मालवीय, अनुराग मिश्रा, रामू टेकाम और मनोज आर्य जैसे नेता जिले की राजनीति में वर्षों से सक्रिय हैं और टेकाम को छोड़ सभी की उम्र 45 के पार है। ऐसे में यदि इनमें से किसी को भी उम्र के कारण जिला अध्यक्ष बनने से वंचित कर दिया गया तो संगठनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है। चूंकि इन नेताओं के आसपास ही जिले की कांग्रेस राजनीति घूमती है, ऐसे में अनुभवहीन नेतृत्व इन दिग्गज नेताओं के बीच अपनी पकड़ बना पाएगा, इसमें संशय है।
स्टाम्प होल्डर अध्यक्ष की आशंका
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जिला अध्यक्ष पद के लिए केवल उम्र का पैमाना लागू किया गया तो यह पद केवल एक स्टाम्प होल्डर बनकर रह जाएगा। पार्टी के विभिन्न गुट अपने-अपने लोगों को इस पद पर बैठाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और यदि किसी एक गुट का व्यक्ति अध्यक्ष बन भी गया, तो बाकी गुट उससे दूरी बना लेंगे। इससे संगठन की एकजुटता प्रभावित होगी और संगठन सर्जन अभियान अपने उद्देश्य से भटक जाएगा। ऐसे में जिला अध्यक्ष को पार्टी के भीतर नीतियों से ज्यादा गुटबाजी के हिसाब से काम करना पड़ेगा, जिससे संगठनात्मक निर्णय भी प्रभावित हो सकते हैं।
वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पर प्रश्नचिह्न
नई नीति के लागू होने से कांग्रेस के उन वरिष्ठ नेताओं की भूमिका पर भी प्रश्न उठने लगे हैं, जिन्होंने कई वर्षों तक पार्टी को मजबूत करने में योगदान दिया है। यदि नेतृत्व की बागडोर अनुभवहीन हाथों में दी जाती है, तो वरिष्ठों की उपेक्षा स्वाभाविक रूप से पार्टी में नाराजगी को जन्म दे सकती है। इससे कांग्रेस का लक्ष्य पाने का सपना सिर्फ सपना ही रह जाएगा।
आखिर मेंज
जमीनी हकीकत यह है कि संगठन सर्जन अभियान यदि केवल आयु आधारित चयन तक सीमित रहा, तो इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर हो सकती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि पार्टी हाईकमान को इस नीति पर पुनर्विचार कर समन्वय की रणनीति बनानी चाहिए, ताकि संगठन को वाकई में सशक्त किया जा सके न कि केवल दिखावे के तौर पर नया नेतृत्व सामने लाया जाए। वरना यह प्रयास भी पार्टी के भीतर उठते असंतोष की भेंट चढ़ सकता है।




