कांग्रेस में फिर घमासान, कद्दावर नेता को जिला अध्यक्ष बनाने के लिए दौड़- धूप
विपक्ष में रहने के बावजूद खुलकर सामने आ रही गुटबाजी, क्या कांग्रसी मिशन में पास होंगे या फेल?

बैतूल। जिला कांग्रेस में उभर रही गुटबाजी के चलते जिले में कांग्रेस एक बार फिर दो धड़ों में बंटती दिखाई दे रही है। मौजूदा अध्यक्ष हेमन्त वागद्रे की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट एक धड़ा, कांग्रेस अध्यक्ष का पद ऐसे नेता को सौंपना चाहता है जो धन बल के साथ -साथ जिले के कांग्रेसियों को एक छत के नीचे ला सके। इन कांग्रेसियों का मानना है कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद कद्दावर हाथों में जाने के बाद जिले में कांग्रेस के हाथ मजबूत हो जाएंगे और भाजपा को सीधी टक्कर देने का माहौल भी बन जाएगा, लेकिन अंदरखाने से छनकर बाहर आ रही खबरें यह बता रही हैं कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
नेतृत्व परिवर्तन सम्भव हो पाएगा या नहीं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन मौजूदा हालातों पर गौर करें तो गेंद अभी राहुल गांधी के पाले में घूम रही है जो जिला कांग्रेस कमेटियों के गठन और जिला अध्यक्ष के अधिकारों को लेकर गम्भीर मंथन में जुटे है। हाल ही में दिल्ली में आयोजित जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों की बैठक में हेमन्त वागद्रे से राहुल गांधी का मेल मिलाप भी यहां नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर अध्यक्ष बदले या न बदले, लेकिन संकेत साफ हैं कि भविष्य में कांग्रेस को जिले में इसके परिणाम नहीं, बल्कि दुष्परिणाम ही झेलना पड़ेगा, क्योंकि इसके बाद कांग्रेस की राजनीति में गुटबाजी खत्म होने के बजाए और ज्यादा सशक्त रूप से दिखाई दे सकती है।
जतन के बजाए पतन की ओर बढ़ रही कांग्रेस
सूत्रों बताते हैं कि देश मे कांग्रेस को एक बार फिर पुनर्जीवित करने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी पूरा जोर लगा रही है। ऐसे में प्रदेश , जिला और ब्लाक स्तर का प्रत्येक कांग्रेसी भी पार्टी को मजबूत करने की मंशा पाले हुए है। हर एक कांग्रेसी की उम्मीद है कि कांग्रेस एक बार फिर देश के राजनीतिक धरातल पर नजर आए। यही वजह है कि जिला कांग्रेस का एक धड़ा यह मानकर चल रहा है कि मौजूदा नेतृत्व में कांग्रेस की नैया पार लगना लगभग नामुमकिन है। जिले की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले नेताओं समेत प्रदेश संगठन में शामिल नेता जिले की बागडोर अन्य हाथों में सौंपने के लिए लालायित हैं।
एक वरिष्ठ कांग्रेसी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष ऐसा होना चाहिए जो धन बल के साथ साथ अपने राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए जिले में कांग्रेस को मजबूती प्रदान कर सके। उक्त कांग्रेसी का इशारा साफ है कि धन बल के साथ राजनीतिक कौशल दिखाने में आखिर कौन से नेता सक्षम हैं। हालांकि प्रयास यह भी किए जा रहे हैं कि अध्यक्ष का पद किसी आदिवासी पूर्व विधायक को भी सौंप दिया जाए। राजनीति के जानकार इस कवायद को कांग्रेस की फूट से ही जोड़कर देख रहे हैं।
पहले भी घाटे में रही कांग्रेस, अब भी कोई फायदा नहीं
बेशक जिले का प्रत्येक कांग्रेसी पार्टी की मजबूती को लेकर लालायित नजर आ रहा है, लेकिन सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अध्यक्ष की बागडोर किसी और हाथों में जाने के बाद क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा। राजनीति के जानकार इसे सिरे से नकार रहे हैं। जानकारों का मानना है कि वर्तमान में जिले की पांचों विधानसभाओं में भाजपा के विधायक काबिज हैं। हाल ही में बिना किसी व्यवधान के भाजपा जिला संगठन के चुनाव भी सम्पन्न कराये जा चुके हैं। यह स्पष्ट है कि भाजपा अपने मिशन को लेकर काफी दूर निकल चुकी है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली की तुलना की जाए तो अपने मिशन को लेकर भाजपा प्लस में है।
दूसरी तरह कांग्रेस की बात की जाए तो कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी का खेल नया नहीं है। यह हमेशा होते आया है। मौजूदा हालात भी कुछ यही स्तिथि बयां कर रहे हैं। मान लिया जाए कि जिले में कांग्रेस का नेतृत्व यदि दूसरे हाथों में दे भी दिया गया तो क्या ग्यारंटी है कि दूसरा गुट आसानी यह बदलाव स्वीकार कर ही लेगा। यदि अध्यक्ष नहीं बदला गया तो पहला गुट इसे अपनी हार ही समझेगा। दोनों ही स्थिति में यह कहीं से कहीं तक संभव नहीं है कि जिले में गुटबाजी पूरी तरह खत्म हो जाएगी और सारे कांग्रेसी अपने गीले- शिकवे भूलकर एक मंच पर नजर आने ही लगेंगे।
नेतृत्व क्षमता पर खरे उतरे हेमन्त, कुनबी समाज का बड़ा चेहरा
कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान के बीच एक तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि वर्तमान कांग्रेस जिला अध्यक्ष अपने कामों के प्रति समर्पण के कारण अच्छी छाप छोड़ने में कामयाब हुए। राजनीति के जानकार बताते हैं इसके लिए हेमन्त वागद्रे के दो साल के कार्यकाल को नजरअंदाज करना सही नहीं माना जा सकता। विधानसभा चुनावों के कुछ ही महीनों पहले उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया था। भले ही कांग्रेस जिले में पांचों विधान सभा सीट हार गई, लेकिन चुनाव के बाद कांग्रेस की मजबूती को लेकर हेमन्त की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाना ठीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि चुनाव के बाद हेमन्त ने राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के निर्देशों का अक्षरश: पालन सुनिश्चित किया है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। समय पर पार्टी गाइड लाइन के अनुसार विभिन्न मुद्दों को लेकर होने वाले धरना प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक क्षमता का भी बेहतर परिचय दिया है।
सबसे बड़ा फेक्टर यह है कि हेमन्त उस कुनबी समाज का बड़ा चेहरा हैं, जिस कुनबी समाज का दखल पूरे जिले में विधान सभा चुनावों के दौरान देखने को मिलता है। नेतृत्व के बदलाव के दौरान राष्ट्रीय नेतृत्व हो या फिर प्रादेशिक हेमन्त से जुड़े इस फेक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चुनावों की दृष्टि से यह फेक्टर जिले की पांचों विधान सभाओं में काफी महत्व रखता है। हाल ही में अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस जिला अध्यक्षों की बैठक के दौरान दिग्गज नेताओं के बीच दिया। हाल ही में अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस जिला अध्यक्षों की बैठक के दौरान दिग्गज नेताओं के बीच दिया गया। प्रेजेंटेशन में भी उन्होंने राजनीतिक क्षमताओं को लेकर राष्ट्रीय नेताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है।




